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Friday, March 16, 2012

मिलन

मिलन
घनघोर कालि अमबस्या की रात
चांदनी को प्रतीक्षित है नई प्रभात
हर्षित मन, मन मे मधुमास
भरा उल्लास, मिलन की आश
दिन प्रतिदिन घटेगी कालिमा की लेश
पक्षकाल मे दूरी न रहेगी अबशेस
मिलन का सन्देश, होगी पूनम की रात
चाँदनी फैलेगी, गगन मैं रोशनी की बरसात

होने को  है प्रभात, चांदनी हो गई उदाश
फैला सूरज का प्रकाश,बैरी हो गया आकाश
चाँद अब छिप जायेगा
दिन प्रतिदिन घट जायेगा
पक्षकाल मे मिट जायेगा
बिरह की कालि रात फैलाएगा
होगी अमबस्या की अँधेरी रात
न होगा मिलन, न होंगे चाँद चांदनी साथ
फिर जब होगी पूनम की तैयारी
चाँद निखरा, चांदनी निखरी
भुबन से आकाश तक बिखरी
चांदनी आज जो रुपमे संवरी
पुनमको फैली  पुरे गगन में,
बिछुरकर, फिरमिलन की चाह मे
मैं बैठा  सँजोए भाव मन में;
चाँद चांदनी का मिलन देख पूनम मे

:- सजन कुमार मुरारका


 

अश्क

अश्कindia.lalit@gmail.com
यह अश्क आँखों से जब निकलता है
या फिर दिल मैं जब उतर जाता है
न पता नस्तर सा कंही चुभ जाता है
हर ख़ुशी भी दर्दे ऐ दिल बताता है
वक़्त ही है जो और रुलाता
करवटे बदल बदल कर नहीं बिखर जाता
जिंदगी की कडवाहट, सफ़र की गर्द
वक़्त के साये मैं हो जाते है सर्द
यादों के साये मैं गुजरता नहीं वक़्त
मिटा दे यह गम, ज़माने मैं नहीं ताकत
खुद-ब-खुद यह अश्क सैलाब बन जाता
लाख संभाले दिल ,आँखों से निकल आता
अश्क आँखों से निकलता, दिल मैं समांजाता

:- सजन कुमार मुरारका 

कैसे करूं मैं आज कविता ?

कैसे करूं मैं आज कविता ?
छंदों से करदूं आँख मिचोली,
या लिख दूं कोई सुरीली बोली ...
शब्दों की लाली रच दूं,
या रंग दूं पेचीदा अक्षरों की होली ..

कैसे करूं मैं आज कविता ?

वर्णन करूं प्रकृति का रूप,
या भर दूं पन्ने लिख बिरह का दुःख ...
बयान कर्रों कोई प्रेम गाथा,
या रुदन करूँ लिख गरीबों की भूख ...

कैसे करूं मैं आज कविता ?

लिखूं राजनीती की बातें,
या अंकित करूं माँ की ममता ...
चर्चा करूं देश के इतिहास की,
या सिध्ध करूं युवा पीड़ी की क्षमता ...

कैसे करूं मैं आज कविता ?

कलम आज तू खुद ही कवी बनजा,
अपनी स्याही से खुद ही कोई रचना रचा ...
खुली आँखों से अँधेरा देख रहा हूँ मैं,
और आँखें बंद करूं तो जैसे कोई कोहराम मचा .

कैसे करूं मैं आज कविता ?

:- सजन कुमार मुरारका
 

कैसी होती है कबिता

कैसी होती है कबिता
वह जाये जिसमे छंदों की सरिता
भावों की लालिमा, दुखों की गीता
स्वप्नों के बादल, बिरह की बयथा
अनबूझी पहेलियाँ, सुलझी हुई कथा
ऐसी ही होती है कबिता
जिसमे लिखी सारी बाते
मन को भाये, बरबस हंसी आये
साथ लेकर रुलाई, सोच बिबश्ताए
आंखे बरबस भर आये
ऐसी ही होती है कबिता
एकाकीपन की छटपटाहट,
ममता भरे शब्दों की ललक
बंद आँखों से दुनिया देखना
खुली आँखों से स्वप्नों मैं खोजना
पास रहकर भी दूर हो जाना
दूर रहकर भी हर पल साथ रहना
ऐसी ही होती है कबिता
जंहा छंद स्तब्द हो जाये
जो है लेखक की मनोब्य्था
यह है सच्चे भावों की रचयिता
ऐसे लिखी जाती मन से छंदों की गीता
:- सजन कुमार मुरारका

रिश्ते !

रिश्ते !
सुलगते रहते हैं सारी उम्र
कड़वा सच, बेबसी का
गुस्सा निगलते,चुप है, है  जो शर्म
अबिवाहीत की तरह !

यह चिंगारी है मनके अंगारों की तरह
फिर भी भस्म नही होते जलकर
ख़त्म नही होते,
सहते हैं जिंदगी भर
किसी पुराने घाव की तरह!

दिन मैं भी तारे दिखते है
कैसे पहचान लेंगे चहेरे से
गिरगिट की तरह रंग बदलते
हमेशा साथ है साये की तरह !

गीली लकड़ी जैसे
कड़वा कसैला धुँआ उगलते
कभी भी जलकर ख़त्म नही होते।
सताते हैं जिंदगी भर किसी प्रेत की तरह!

सहज है जिंदगी,
फिर भी मज़ा नहीं अगर
शिद्दत की मुहब्बत थी मगर
गुजर रहे हैं क़रीब से अनजान राही की तरह !

दिन गुज़रता,अस्तित्व फैलाता
मन जागकर पल दर पल खोजता
माँ के आंचल की तरह,
सधवा के  सिंदूर की तरह,
अंधे की लाठी की तरह,
 कलाई मैं बहना की राखीके तरह,
फूलो मैं खुसबू की तरह,
सीप मैं समाये मोती की तरह.
 रूह से हो जिसका नाता
खोये हुवे रिश्तों मैं,
अपनापन जिस मैं समाता
ढलती शाम में आनेवाले सुबह की तरह !

:- सजन कुमार मुरारका

.जरा सी बात

.जरा सी बात
आहट बारिश की जरा जरा सी,
आहट किसी की जरा जरा सी,
कही कोई आवाज़ जरा जरा सी,
आज नाउम्मीद है जरा जरा सी,
कल उम्मीद की बारिश जरा जरा सी
तेरी खुश्बू भरी पैगाम जरा जरा सी
मेरी तन्हाई मे महक आती है जरा जरा सी.
कल की आवाज सुन रहा जरा जरा सी
आज ख़ुशी है जरा जरा सी
दुख को समझा आपने, बात है जरा जरा सी

:- सजन कुमार मुरारका 

.नवबर्ष

.नवबर्ष
फिर मची दुनिया मैं हलचल,
क्या बुरा हुआ, हुआ क्या भला;
बीते साल की चर्चा का बाज़ार चला
यह साल चला, नया है जो आनेवाला

सभी ने कहा मुबारक हो नयासाल
पुरातन गया, नये का स्वागत बिशाल
हर्ष-बधाई, संदेशों का माया जाल
नव वर्ष की शुभकामनाएं बेमिसाल

पर अपनी गति से समय चला;
वह साल चला, यह साल भी चला।
आनेवाला ’कल’ ’आज’ लगे भला
जो  "कल" "आज" था वह बीत चला

जग मैं उमंग भरी, नाचे जग सारे
जैसे गगन में रवि-शशि-तारे,
मन हर्षाये नई आशाओं के सहारे
चातक सी उम्मीद रख बेचारे।

वक्त बदला-ऋतु बदली, मौसम बदला;
चर्चा-विवाद, घात-प्रतिघात का दौर चला
 दंगा-फसाद, हम-तुम का जोर चला
वह साल चला, नया साल आ चला।

आज अंतिम,कल होगा नया दिन पहला
खिले नया सूरज, आशा का दीप जला
रिश्ते-नाते,प्रेम- प्यार का बोलवाला
जीबन मैं न हो संताप, न दुःख की ज्वाला
मुबारक नया साल, सब का हो भला

:- सजन कुमार मुरारका
 

सोच

सोच
 अब थक कर निढाल
अपने किये से बेहाल
बेठ अँधेरे कोने मैं
मकरी सा बुनता जाल
हर धांगो मैं खोज रहा
टूटे हुवे रिश्तों का हालचाल
संध्या की दहेरी पर
डर रहा हूँ सोच आगे का हाल
बूढ़ा होता जिस्म, डगमग चाल
बेअसर है अपनेपन का सवाल
... खुरदुरे हांथोमैं फूटे छाले
थामा था जिन रिश्तों को अकेले
बट गये अब, बन गये निराले
जिनसे बहेता है रक्त, साँझ अकेले
सुबह एकाकीपन से आंसू निकले
बुन रहा हूँ रिश्तों के जाले
बेठ खाली घर के कोने मैं बेहाल
होकर निढाल, सोच अपना हाल

:- सजन कुमार मुरारका

प्रेम

प्रेम
निश्चल प्रेम कैसा होता है
रातोमें जुगनू सा जगमगाता
चाँद को चांदनी से चमकता
जो हमें दिखाई नहीं देता
शायद हवा की तरह होता है
... दिखाई देती है नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी बातें
दुनिया-भर के समझोते
शायद ज्वाला की तरह होता है
पता नहीं कौन-सा बिश्वास
या फिर ऐसा कोई एहेसास
पूरी हो रही हो जैसे कोई आश
शायद छाया की तरह होता है
फूलोंवाले बग़ीचे में तितली सा
रंग-बिरंगी दुनिया मैं इन्द्रधनुस सा
बच्चों के लिये माँ का आंचल सा
शायद कल्पना का आधार होता है
चाहत को प्रेम बताना
साथ रहने को प्रेम माना
देह वासना को प्यार जाना
शायद जरुरत की परछाई होता है

:- सजन कुमार मुरारका 

अफसोश

अफसोश

मेरे गम पर आँशु तो बहाव
दुःख के सैलाब मैं डूब जाव
जब टूटकर बिखरा कोई ख्वाब
भटक रहा, मिला ना पराव
अधूरी मंजिल, न कोई ठहराव
मेरे गम पर आँशु तो बहाव
जिसे पाकर खोने का पछताव
मुर्ख सा हारा जो हर दांव
मग्न था, न था कोई लगाव
निकला वक्त चुपचाप दबें पांव
मेरे गम पर आँशु तो बहाव
पानी के बुलबुले जैसा ताव
बेतुकी-निरश चिंताओं का प्रभाव
जिंदगी से आँख-मिचौली, न लगाव
अब टीस रहें है यादों के पुराने घाव
मेरे गम पर आँशु तो बहाव
रिश्तों मैं भी मिला अनादर का भाव
शियार से लोंगों मैं चतुराई का अभाव
हर एक को बिस्वाश करने का स्वभाव
हारी हर बाज़ी, अब हो सिर्फ पछताव
मेरे गम पर आँशु तो बहाव

:- सजन कुमार मुरारका

स्वीकारोक्ति

स्वीकारोक्ति
 मन ने कर लिया स्वीकार
जिंदगी तो अब यहही है

अब जोशे खून मद्धिम हो चला
जब जीबन अंत की और चला
एक धुंदली सी परछाई छोढ़ चला
अंतिम पढ़ाव पर कदम बढ़ चला
अब कियों करूँ किसी का इंतजार
जब मन ने कर लिया स्वीकार
जिंदगी तो अब यहही है

क्या पता कोई दिल पिघले ना पिघले
कोई साथ चले या ना चले
सूरज कंही डूब जाये साँझ तले
क्या पता अब मंजिल मिले ना मिले
अब कियों करूँ किसी से मैं मनुहार
जब मन ने कर लिया स्वीकार
जिंदगी तो अब यहही है

चंदा की चांदनी मैं पूनम की रात
झिलमिल तारों मैं रौशनी की सौगात
तपती धरा पर गिरे अगर बरसात
आशाओं की कई ऐसी अनगिनत बात
बीते लम्हों से हारा,कैसे कंरू मन को तैयार
जब मन ने कर लिया स्वीकार
जिंदगी तो अब यहही है

जो लढ़ाई मैं ने लढ़ी
यातनाओं के बंधन की ऐसी थी कढ़ी
हर पल निराशा और छटपटाहट बढ़ी
भाग्य फल की बातें केवल किताबों मैं पढ़ी
झेलते झेलते  आगया जीबन के अंतिम द्वार
तब मन ने कर लिया स्वीकार
जिंदगी तो अब यहही है

क्या भरोसा मिट्टी का घरोंदा
सूखे बंजर खेत का कोमल सा पोदा
हिसाब के खाते मैं लिखा घाटे का सौदा
 अनबुझी पहेली सा सुलझे यदा कदा
समझोता करूँ कैसे जिंदगी से बारबार
अब मन ने कर लिया स्वीकार
जिंदगी तो अब यहही है
    
:- सजन कुमार मुरारका

बिरह-बेदना

बिरह-बेदना

तेरे अश्रु जल से भरे नयन
सर्द हवा मैं जैसे भीगे मेरा तन
तेरे मूक अधरों के कंपन
गहरे तूफान सा बिचलित मेरा मन
तेरे स्तब्द हुये हाथों के कंगन
टूटे हुये दिल से जैसे निकले मेरा रुदन
तेरे बिरह ब्याकुल से कथन
निस्चुप हुये शब्द जैसे निर्बाक मेरे वचन
तेरे निर्जीब से शीतल बदन
स्थिर हुये शिला जैसे सारे मेरे स्पन्दन
तेरे पायलों के रुके जो गुंजन
क्रंदन हुये मुखर जैसे ज्वालामुखी मेरा मन
तेरे पलक के निश्चल से छन
आतुर हुये हर पल जैसे बंद हो मेरे दिल की धढ़कन
तेरे मिलन के मौन से निमंत्रण
चाँद जैसे पूनम को चांदनी से मगन, जागे मेरे मे अगन

:-सजन कुमार मुरारका

बीता- वक़्त

बीता- वक़्त

सचमुच खोया वक़्त, सोये देर तक
इधर उधर की बांते, गप्पे देर तक
उम्र बढ़ गई, मायूसी दूर तक
जागे अब, अफसोश कंहा तक
लोग सभी जगा-जगा कर हारे,
ऐसी नींद हमारी, सोये रहे प्यारे .
लोगों की सज गई फुलवारी
हमने अभी तक की नहीं तैयारी
सब कुछ अपने हांथों से डुबोए ।
फुलवारी कंहा से होए, बीज जो न बोये
कल की फ़िक्र नहीं, आज का ज़िक्र नहीं,
इतिहास की बात क्या, समय रुकता है कंही ?
अब अस्थिर मन में, बेचैनियाँ
और चीख़ना -सोना नहीं ! सोना नहीं !
अपमान भरे आँसुओं में डूब कर जब जगा
मर गई नींद, उम्र भर का रतजगा !

:-सजनकुमार मुरारका

रिश्ते अब निभते नहीं

रिश्ते अब निभते नहीं

रिश्ते अब निभते नहीं हमारे बीच
अबिस्वाश की आंखें
और कुढ़न वाली बांते
रिश्तों को जोढते जोढ़ते
 चाहत ही टूट जाती हैं हमारे बीच !

अपने सगों का प्यार, बार-बार
हो जाता है तार-तार
अमीरी और गरीबी की दीवार
खढ़ी हो जाती है हमारे बीच !!

रिश्ते जिन्हें पुस्तोंने बड़ी शिद्दत से
खड़े किये थे बरगद विशाल से
पर,फिरभी छोटे हो जाते स्वार्थ से
और बिखर जाते हैं, हमारे बीच !!!

आंखों में,शायद, खटक जाती
एक दुसरे की खुशी
बाते सम्बन्ध की निरर्थक हो जाती
 निश्चित बनाती दूरी हमारे बीच
कियों की रिश्ते अब निभते नहीं हमारे बीच

:-सजनकुमार मुरारका

तेरी यांदे

तेरी यांदे

मयखाने में साकी जैसी
आँगन में तुलसी सी
गीता की वाणी-सी
बरगद की छाया-सी
सावन की बारिश जैसी
शीतल हवा पुरवाई-सी
बगिया की अमराई-सी।
गंगा की लहर-सी
बसन्त की सुरभि जैसी
सागर की गहराई-सी
हिमालय की ऊँचाई-सी।
बगीचे की हरी दूब-सी
नभ में छाये बदल जैसी
फूलों की क्यारी सी
मृग में छिपी कस्तूरी सी
पूनम में चांदनी सी
रंगों में इन्द्रधनुष जैसी
मेरे में हिम शिला सी
चुभ जाती है काँटों सी
मौत मे जीने की चाहत सी
तेरी यादें साथ रहती है परछाई जैसी

:-सजनकुमार मुरारका

पिया मिलन की बात

पिया मिलन की बात

सुनीसुनी सी रात, मन भीगा
याद आई तेरी, मन बहका,
आज मंज़र थे कुछ जालिम से
याद आये दिन वह मिलन के !
सावन के भीगी भीगी रातों मे,
दूर गगन में जब बिजली चमकी,
बाँहे फैलाये तू लता सी चिपकी !
आँहे तेरी, जैसे बजा राग मल्लाहर
सखी, जैसे बैठी हो कर सोलह शृंगार
सुर्ख नैनों में आतुरता की धार !
लगा मधुर स्पर्श जैसे शीतल फुवार,
काली घटा में चमकी  मन की आग
सांसे तेरी छेढ़ गई समर्पण  के राग !
नभ में समाये बादल,भीगी भीगी रात
सखी तुम में समाये हम, मिलन की सौगात !
 सो न पाये, करवटें बदलते बीती सारी रात,
भूल नहीं पाएंगे, दो दिलों की वह मुलाकात !
तुमसे कहनी है कोई बात, सूनी सूनी सी रात
अम्बर से बरसे जल, धरती से मिलने की बात
तरसे पिया मिलन को,लोग कहें बरसात।


:=सजनकुमार मुरारका

लफ्ज

लफ्ज

मैं ने मुफ्त का समझ लुटाया बेसुमार
जिस कल्पना के लिये एक लफ्ज काफी था
उसे सो-सो लफ्ज दिये बेकार

परायों की दुनिया बसाई
अपनी तो फ़िक्र नहीं थी
दौलत यह बिना बात परायों में लुटाई

मुझे मालूम न था-लफ्ज घिसते,
मिट जाते, बिखर जाते
छोटा सा एक लफ्ज कितना सताते

 मालूम नहीं कब से यों ही चले आते
न जाने लोंगों ने कैसे कैसे संवारा
कितनी तन्हाई, कितना दर्द साथ लाते

यह जो आया,सभी ने स्वीकार होगा
अरमान दिल के सुनाने को
हर दिल ने इसे संदियों से पुकारा होगा

जब मेरी बारी आई, मैं चुपचाप था लाचार
देखता हूँ मेरे पास कोई लफ्ज नहीं
समझाने को "प्रियतम" तुम से हैं कितना प्यार
मैं ने मुफ्त का समझ लुटाया बेसुमार

:-सजन कुमार मुरारका

तेरा प्यार...

तेरा प्यार...

रह गया मेरे पास...
तेरा प्यार, तेरी तकरार
बदन की खुशबु,
बालों की महक
अनबोले लम्बे कथन
अनचाही चहक
वह रुदन
कोशीश हँसने की
कुछ सौदेबजी
लम्बी खामोशी
बातें तन्हाई की
रातों की मस्ती
ढल था हुआ आंचल
तेज सांसों की
सीने पर हलचल
बिन सावन बरसे बादल
रह गया मेरे पास...
तेरा प्यार, तेरी तकरार

:-सजन कुमार मुरारका

जुदाई

जुदाई

हर रात के बाद रात आई
जख्म पर छिढ़का किसी ने नमक
कैसे सहें उनकी बेरुखाई
सुबह का बन्दा हुआ सफ़र
दर्द भरी यादों की चुभन
नादान दिल इन से बेखबर
हसरत भरी तमनाएँ
स्वप्ने में आरजू सजाएँ
आशाओं के उगाये महताब
सारी-सारी रात देंखें तेरा ख्वाब
थोढ़ी सी मिलन की आश
मन में जगाये जीने की प्यास
सह नहीं सकते तुम्हारी जुदाई
हर पल, हर लम्हा तेरी याद आई

:-सजन कुमार मुरारका

सावन बरसे नयनों में

सावन बरसे नयनों में

बरसात के  दिनों में
छाये बादल अम्बर में
रिमझिम बरसे पानी में
धरती शीतल शिहरण में
मिलन के आलिंगन में
महक गई फिजा में
प्रियतमा को जलाने में
दूर परदेशी प्रिया में
जागे प्यार मन में
चुभन भरे बिरह में
जागी कल्पना कवी में
"मेघ" को दूत बनाने में
रचे भाव कविता में
"मेघदूत" के छंदों में
तढ़पन लगी प्रीतम में
नयन बरसे सावन में
शीतल झरते नीर में
अगन लगी सजनी में
शिहरण जागी मन में
विरह झलके नयन में
 बिजली जैसे नभ में
सावन बरसे नयनों में

:-सजन कुमार मुरारका

जलन

जलन

काफी नाम सुना था उनका,
 ऊँचा ओहदा, मान, सन्मान
नाम जिनका अपने आप में रखे पहचान
उन के जरिये पहचान बनाने
उनके पास आश लेकर पहुंचे !
तब मेरी सचाई सामने आई
भ्रम फिर भी नहीं टुटा,
मेरी नजर में वह हो गये गुनाहगार
सिर्फ और सिर्फ एक आम इन्सान
और कर देता हूँ शामिल भीड़ मे
बिना सोचे, समझे, कुढ़न से
गहरा सदमा, मानसिक कस्ट
कितनी पीड़ादायी होती सचाई
उम्मीदों का टूटना
नहीं कर सकते बर्दास्त इस को,
 लगता है वो एक साज़िश है
किसी अच्छे खासे प्रयास को
सिरे से नकार देने की,
बेबस होकर जलन से लगता है
यह उनका अपना अहम्
दिखाने की, जताने कि-क्या हो तुम ?
ईर्षा भाव से बिबेक खोकर,
लगता है वह कुछ भी तो नहीं ...।
न तो वह है महादेबी वर्मा
नहीं "गुलजार", न दीनकर
और न "हरिबंसराय बच्चन"
फिर किस लिये इतनी हिम्मत...?
उनका जरुर है अपना मुकाम
नाम याद रखने को बेताब लोग
उन जैसो से भरी पड़ी दुनिया,
किस किस की सुने
किसे याद रखे, किसे भूले
हर दिन उग आते मकरी के जालों से,
दुर्भाग्य से एक अदना सा पागल
सीमाओं को तोढ़कर,
भानुमती का कुनबा जोढ़कर
हस्तियों में, नामचीन लोंगों में
अपनी पहचान बनाने, नाम फ़ैलाने
कामयाब हो गया जो कुछ भी नहीं है,
न जानता हो छंद, भाव और लेखन
और जिसका प्रयास भी बेतुका
नाम फ़ैलाने की सुविधा के लिये
इधर उधर की तुकबंधी जोढ़कर
अब तक खुद को कवी समझता !
 मैं ज्वालामुखी सा फुट रहा,
"ना"सुनकर मन ही मन मर गया
और एक हारे हुवे जुवारी की तरह
वही चिराचरित सड़ांध मारता,
दर्द, आंसू और खीज से बना
एक आम इन्सान
फिर अंधरे में गुम होने के डर से
उन्हें देता हूँ तकमा फलाना आदमी...
मेरे बढ़ते कदम को रोकता है,
उसे शायद कविता की समझ नहीं !
खुद को स्वान्तना देकर "फ़लाने" से
भीढ़ जाने को हो रहा हूँ तैयार.....
मन को बिश्वास दिलाता हूँ
 नाम मेरा अपने आप में लोग जानेगे
रखेंगे पहचान-"यह कोई फलाना नहीं है"

:-सजन कुमार मुरारका

ब्याकुल मन

ब्याकुल मन

काहे मन मोरे ब्याकुल तुम अपार
भटके दर-वक्त-दर, चिन्ता भरा संसार
कभी घर की उलझन,कभी संतानों का भार
कभी धन का अभाव, कभी सताये ब्यापार
मान-सन्मान टूटे धरु कैसे धीरज संभार
राग-अनुराग, भय-क्रोध का नहीं पारावार
कभी कलह, कभी अभिमान, कभी प्यार
कभी परम मित्र के साथ दुखदायी तकरार
कभी मिलन, कभी बिरोह की ब्यथा बेसुमार
हार-जीत,शत्रु-मित्र, दमन के लिये तैयार
कभी निराशा, कभी आशा की है भरमार
कभी कंचन-कामनी,कभी धर्म के द्वार
कभी योग, कभी भोग, कभी हो बीमार
सुख की तृप्ती-मृग-तृष्णा जैसी बारबार
" चिन्ता-चिता समान", दुःख करे बेकार
धीरज धरो,संयम की है परम दरकार
काम -क्रोध- मद -मोह- मत्त का नहीं सार
सब छोढ़, भज मन प्रभु चरण धीरज धार

:-सजन कुमार मुरारका

अंतरद्वन्द

अंतरद्वन्द

घर के पीछे का पीपल का पेढ़
जिसके भूरे-पीले तने में
मोटे-मोटे धब्बे,भद्दी-भद्दी धांरियां
समय की मार से हो जाते
पडे-पडे ही,गुमसुम से चुप-चाप
बीते हुवे कल में खो कर,
यादों के विशाल बरगद के समान
सोच में ढूंढता हूँ अपने अछे-बुरे दिन
ऊब-से, किसी-किसी मौके पे
केवल कुरेद लिया करता हूँ अपने-आप
दूर-दूर तक एक धुंधलापन छा जाता,
सहसा सोच की आंधी झकझोर जाती
अपने मन के आईने के सामने,
आदमखोर सी खुद की आकृतियां
और हिंसक पशुता सी स्वार्थ की लालसा
अधिक गहरा जाता बेशर्मी का तमाशा
बजता बिगुल अंतर्मन में, फिर खामोशी-सी,
सोच,कांप कर सिहर-सिहर जाता ।
अच्छाई-बुराई और विवेक की लढ़ाई
 क्या जाने क्या सोच अचानक रुक जाता
चढा कोहिनी,हाथ पैर घुमाकर अपनी बुद्धी से
अधीर हो जाता हूँ सब कुछ सही ठहराने
धब्बे पडते हुए चरित्र में, झूठ की चादर
अपनी थाह नाप कर,समझने=समझाने
लौट जाता हूँ वापस, वही राह में,
यह बदनुमा दाग, पेढ़ के तने जैसा बस रह जाता -
खुला विवेक और मन सूना-सूना सा
पानी=पानी होकर, निश्चुप, विवश
वापस चतुर दिमाग से हार जाता
 अब रात आ गई, ठंडी हवा हो गई -
मौन था, मन भटक रहा था!
मैं था और उस पेढ़ की छाया थी,
मोटे-मोटे धब्बेवाला,भद्दी-भद्दी धांरियांवाला
मेरे अतीत को समेटे, आगे से अनजान
मैं इस अंतरद्वन्द को गहराई में जाकर
खोज निकाल करूँगा उसे जरुर बाहर


:-सजन कुमार मुरारका

समय के साथ चले

समय के साथ चले

सुख, दुःख, प्यार और जलन

यह दौर कब तक झेले

ख़ुद में मगन, वक़्त कैसे निकले

अपने किये  जुल़्म खुद पर

फिर भी चुप, कुछ नहीं बोले

देखना था ये  कब तक चले।

कोशिशें तो थी खत्म करने की

क़िस्मत से हल नहीं निकले

अधूरी ख्वाइस, सपने, वादे

उम्मीद के साथ ज़िन्दा रहते

कोई सचाई या कोई यादे

सच के लिबास में सजा झूठ

क्या सही, क्या गलत,

ये वक्त़  खुद तय करे

वाजिब था या गैरवाजिब

बस जिन्दगी जिये या मरे

समय की पाठशाला में उम्र भर

सफलता पाने के सहारे

पत्थर बना खड़ा ही रह गया

और मंजिल से मंजिल भटक

नासमझ दूर तक चलता रहा

जिस्म पर उम्र की परछाई

बालों में सफेदी की चमक

आँखों से ओउझिल राहें

फिर भी हताश नहीं,

नाउम्मीद कियों भले

जो सही माना मन में

और समय के साथ चले


:-सजन कुमार मुरारका

कन्या-जनम

कन्या-जनम


पुत्र जनम शुभ, कन्या जनम कष्टकारी,
करे भेद-भाव, सब बिधि, अबिवेक-अबिचारी
न जानत, जननी रूप कन्या की छबी न्यारी
ध्यान दीजे, संतान सकल, सम प्रेम अधिकारी

शीतल वचन, कोमल मन, स्नेह सुख परिभाषी
मंगल मूरत, नित सेवत, सत चित, प्रकृती से दासी
निसदिन बोलत, प्रेम सहित डोलत,धरत सुखराशी
कबंहूँ नहीं मांगत, न कबंहूँ कठोर संकल्प फरमासी

करुनामय,रसमय, लछमी रूपा आनंद सुधा बरसाती
कोयल सी कुंजन करत, तितली सी मंडराती
सृष्टि की अधिकारी, सेवक मान, जग में जी पाती
कल्पतरु सी दाता,अपने दुःख अपने में समाती

कुंठित,भयभीत, लज्जित सा जीवन परे
मात-पिता,अग्रज-अनुज सब अनुशासित करे
जान कष्ट, शांत भाव-सदा ही धीरज धरे
प्रतिपालक जननी तू जब संतान रूप धरे

विचित्र रचना, भ्रमित माया जगने रच राखी
पराया धन ठहराये, जो धन दुःख में सहभागी
कन्या-दान अति महान कहे सब अनुरागी
फिर भी मांगे धन-दौलत, कन्या बिचारी अभागी

:-सजन कुमार मुरारका

नाकाम मोह्हबत

नाकाम मोह्हबत

छोटी सी बात कर देगी जुदा हम को
हालात इतने बदल जायंगे, मालूम न था हम को,
क्या यह रिश्ता इतना कमज़ोर था हमारा ?
जिसे चाह, पल भर में छोढ़ दिया बेसहारा
जो एक लम्हे के लिये भी होते ना थे दूर
आज उन्हीकी जुदाई के गम सहे, बेकसूर
कभी उनके ही रास्ते पर बिछाये थे हम ने फूल
आज उन्ही रास्तों पे खुद ही फांक रहे हैं धुल
अब तो दर्द-ऐ-गम रहता है इस दिल में
कोई तो आये, मरहम लगाये इस ज़ख्म में
अब कोई दीवाना कहता,कोई समझता पागल
मगर धरती की बेचैनी को बस समझे बादल
मैं उनसे दूर भले,  वह मुझसे दूर कंहा
यह मेरा दिल जाने, जाने कैसे सारा जंहा
मुहब्बत एक एहसासों की अनबुझी सी कहानी
हीर-राँझा,सोनी-महिवाल, कभी "मीरा"दीवानी
यहाँ सब लोग कहते मेरी आँखों मैं आसूं हैं
जो समझे तो मोती,ना समझे तो पानी है
समंदर पीर का अन्दर, लेकिन रो नहीं सकता
यह आसूं प्यार का मोती, जो रुके नहीं रुकता
मेरी चाहत को समझा नहीं  ओ-दिले बेरहम
हो नहीं पाया, फिरभी तेरे पे मरता हूँ हरदम

:-सजन कुमार मुरारका

होली ...

राधा-श्याम संग खेले होली ......


मोहे न रंग डालो श्याम प्यारे
अंगिया भीगी, मरी जाउं लाज के मारे
संखिया इतराये, देख रास-रंग के नज़ारे
मोहे न रंग डालो श्याम प्यारे

गौरा रंग मेरा,श्याम तुम काले
 तेरे  रंग में रंगी,रंग नया क्या डाले
फागुन बैरी, मस्त बयार जो चले
कान्हा तेरी बांसुरी बोले बोल अनबोले

महका महुआ, पलाश की फ़ैली रंगोली
राधा का दिल धढ़के,नयनों की बोली
कान्हा का रास रसे ,राधा की प्रीत चली
मिटे दूरी,राधा-श्याम संग खेले होली ......

सजन कुमार मुरारका

बेटी ससुराल चली

बेटी ससुराल चली


नये लोग, नये रिश्ते की बुनियाद
डर लगा क्या जाने कैसे होगी आबाद
बिदाकर, भयभीत लज्जित, सहमा
आंसू निकले, चली यादों की परिक्रमा
इस घर में उसकी पहेली मुस्कान
लचीले कदमो में पायल की मृदुल तान
वह उसका पहले पहले तुतलाना
बिना कारन खिलखीलाना, रूठ जाना
धीरे-धीरे बांहों में झुलना, सो जाना
मेरे नयनों में डोले दिन पुराना
वह कमरा, वह बिस्तर, बस्तर-बंद भारी
वह कुर्सी, वह मेज़ ,वह अलमारी
जिनमें रखी किताबें, पुराने कपड़े
फटी पतंग, लाल -पीले कांच के टुकढ़े
वहुत सारी चीज़ें, गुडिया, खिलोने
रेशम की डोरी,झूट-मूट के गहने
और उसका कमरा खाली खाली
अब कैसे बीतेगी दिवाली, होली
दीपों की जगमगाहट, रंगों की रंगोली
कैसे कटंगे यह दिन, यह रात
याद आ रही है हर छोटी सी बात,
क्या जाने उसे बाबुल सा प्यार मिले,
माँ का आंचल, पिता का स्नेह  मिले
खुशियाँ हो सारी, ऐसा संसार मिले,
जब बाबुल की चाह मन से निकले
हर पल सोचता हूँ वह कैसे जीयेगी
गुढ़िया मेरी रो रो कर मर जायेगी
कोन बहलायेगा, वह होगी जब उदास,
मनायेगा ? देकर अपनेपन का अहसाश
माँ की ममता, पिता की ललकार
भाई की सुनी सुनी आँखे में प्यार
वह लाचार, मेरा आँगन छोढ़ चली
वेबस किसी अनजान डगर चली
बेटी ससुराल चली कर आँखे गीली

सजन कुमार मुरारका

जीवन

जीवन

जीवन के रंग कई.. पड़ाव कई
गुजरती है ज़िन्दगी मोढ़ कई
कभी तेज, कभी मद्धम भई
पल ऐसा भी पल आता
जब अध्याय बदल जाता
जीवन से उस जीवन का
फासला पल में तय हो जाता
और मन अटका रह जाता
बीच में कहीं अपना क्षितिज तलाशना
इस पार से उस पार जाना
हमेशा आसान नहीं होता ठिकाना
कहीं विदाई का है तो अबसाद
कहीं पर स्वागत का शंखनाद
भावों का संसार वाक्यांशों से नहीं बनता...
यहाँ तो अश्रुधार है जो बह निकलता

सजन कुमार मुरारका

क्यूँ हुई वह परायी'

क्यूँ हुई वह  परायी'


शहनाई की धुन पर...
बचपन के आँगन को छोड़
दर्द सहती आई हैं बेटियां...
अपने अंश को विदा करते मात-पिता
अकथ पीड़ा महसूस करते आये सदा
और विदा करा कर ले जाने वाले
आँखें नम होती हैं.उनकी भी बिन बोले
विदाई की घड़ी होती ही है ऐसी,
गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने भाई ऐसे
सुबकने लगते छोटे बच्चों जैसे
यह दृश्य इतना हृदयविदारक होता
कल्पना मात्र से मन विचलित लगता
कितना अजीब है अलग हो जाना
 पौधे भी ज़मीन से जब जुदा होते
नये वातावरण में मर जाते
गमले में खिलने वाला पौधा,
 वन में नहीं पनपता
 वनफूल गमलों में नहीं खिलते
 पर बेटिया बाबुलका आँगन जैसे छोड़ती
दूसरे आँगन में कदम रखते
अपने आप वहीँ की हो जाती,
सामर्थ्य केवल उन्हें दिया प्रभु ने,
ऐसी कठोर रीत रिवाज़ जो निबाहने
सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति
और ऐसे में नम आँखों से स्मृति
इन बातों को लेकर खूब उलझता मन.
सारे नियम भी खूब समझता है मन
यादों का धागा पकड़, छूट गए घर
आँगन में गूंज रहे बचपन के कितने स्वर
लम्हे जी आते,.फिर नए वातावरण
स्थापित क्रम,चलता रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को.....
शब्दों को सहेजते हुए उदास मन को
गीत कहीं बज रहा तो कान ही नहीं
रोम रोम सुनता है गीत यही
और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं
निकलते आंसू,शब्द भी खो जाते कंही
शब्दों को सहेजते हुए उदास मन को
नयनों की नमी महसूस कर रहे  जो
इस दर्द से अनजान नहीं हैं. वो
पीछे छूट गए बचपन को
याद करते हुए अपने आँगन को
ललकती... अपने नैहर से सन्देश को
तकती, पथरायी आँखे
बेध डालता यह गीत आत्मा को
कैसे न भीगेगी आँखें! '
क्यूँ हुई वह  परायी' का सवाल
हर किसी के मन में मचाये बवाल
जब स्वर मिलते इस भाव में
बिखरी हुई उदासी है कुछ इस हाल में
भावुक हृदय अगर इस पर कुछ लिखता
तो वह निश्चित ही अनुपम होता...
ऐसे में तो  बस लेखनी हो गई स्तब्द
पीढ़ा के साथ  मेरे बिखरे से शब्द.

सजन कुमार मुरारका

इजहार

इजहार

तुम्हारी नजरें खोज नहीं पाई मेरा प्यार
शायद तुम्हे इस पर नहीं था एतवार
मुंह छिपाये पास से निकल जाती हो हरबार
तुम खुश रहो, है दिल की पुकार
मैं रहूँ या न रहूँ, मिले या न मिले तेरा प्यार
यादों में आऊं या न आऊं, नहीं सरोकार
दुआं फिर भी निकले दिल से बार-बार
जीबन के अंतिम चरण तक है यही पुकार
तुम्हारी खुशी में, मेरी खुशी है बेसुमार
मेरी चाहत शायद तुन्हें लगी हो बेकार
कभी-कभी मेरे मन में आये बिचार
तुम से दिल लगाना ही था निराधार
लेकिन स्वप्न में भी भूलना था अस्वीकार
दिन-रात सिर्फ डोले मन में तेरे बिचार
मेरा अस्तित्व तुम ही में है एकाकार
तुम्हारे ख्यालों से जी लेते हैं हरबार
अब जीने-मरने पर मेरा नहीं अधिकार
न जाने कब दिल छोढ़ आया तेरे द्वार
और मैं ने किया तुम्हे बेइन्तहा प्यार
जानेमन प्यार में नहीं होती तकरार
मजबूर दिल करे तुम्हे प्यार ही प्यार

;-सजन कुमार मुरारका

हर कोई चाहे अपना नाम छपाना

हर कोई चाहे अपना नाम छपाना

अक्सर यह सवाल इन वर्षों में

हर बार अलग-अलग मित्रों ने

जो किसी भी स्तर की कविता लिखने

लगे हैं कई वर्षों से प्रतिभा दिखाने

या कुछेक शौक़ नया-नया अजमाने में

पशोपेश में दोहराते मेरे सामने

बतातें- फ़लाँ व्यक्ति ने सम्पर्क साधा था

कहा आपको मिलनी चाहिये पूर्ण मर्यादा

 हम नए रचनाकारों की रचनायें

प्रकाशित कर रहे हैं, और इसे आजमायें

आपकी भी शामिल करेंगे पाँच रचनाएँ

 तीन हज़ार की योगदान-राशी केबल

छप जायेगी किताब और नाम का लेबल

पुस्तक की दस कॉपियाँ भी दी जायेगी

आपका नाम और कविताएँ किताब में आयेगी

नाम छपा देखने की इच्छा भारी

पर “तीन हज़ार" पैदा करता मुश्किल सारी

लगने लगता है,रुपए दें या ना दें?

किताब छपे भी या ना छपे >

कॉपियाँ मिलें या ना मिले ?

संक्षेप में बताऊँ  जो  जवाब

स्वप्न में भी पैसे देने का न देखें ख्वाब…

बिना पैसे लिए यदि  छापे रचनायें

और पुस्तक की कुछ प्रतियाँ स्वेंछायें

अगर मिले तो, फिर मन माने तब छपवायें

लेकिन पैसे देकर दस अन्य के साथ

शामिल होने के विषय में महत्तवपूर्ण बात

कवर पेज पर तथाकथित “संपादक” का नाम

बड़े-बड़े अक्षरों में दिया जाता है अंजाम

कवर पर कहीं नहीं लिखा होता यह पैगाम

मुख़्तलिफ़ कवियों की रचना-संग्रह का काम

10-20 रचनाकारों को शामिल कर

सबसे कई-कई हज़ार रुपए लेकर

उन्हें प्रकाश में लाने का प्रलोभन देकर

मुर्ख बनाया जाता इस प्रकार

अर्थशास्त्र से उदाहरण देकर समझाये

मान लीजिए कि दस कवियों का मनोनयन

आठ-आठ कविताओं का संकलन

पुस्तक में कुल करीब सो पन्नें का आकलन

हर कवि का तीन-तीन हज़ार  अनुदान

पैसा इकठ्ठा हुआ तीस हज़ार के समान

 अगर बीस-बीस प्रतियाँ दी गईं मुफ्त

दो-सौ प्रतियों में ही हो गया काम चुस्त

इसमें पचास प्रतियाँ और जोड़ लीजिए

 अधिक से अधिक ढाई-सौ प्रतियाँ किजीये

ढ़ाई-सौ प्रतियाँ छापने में कितने रुपयें दरकार

अधिक से अधिक खर्च होंगे दस हज़ार

बाकि के बंचे बीस हज़ार का क्या होगा

ये तो “संपादक” जी ही शायद ? भोगेगा

“संपादक”  जी को पैसे मिल गया

पुस्तक के कवर पर नाम आ गया
“संपादक” होने का गौरव मिल गया
मुफ़्त में पुस्तक की प्रतियाँ मिल गई…
बिना कुछ लिखे अपने नाम से किताब छप गई…

कवि को क्या मिला?…

अपना छपा हुवा नाम

जिसका सिर्फ तीन हजार लगा दाम

 ऐसी पुस्तकों की गुणवत्ता का क्या कहना

फिर भी लोंगों को मुश्किल है समझाना

कियों की हर कोई चाहे अपना नाम छपाना

:-सजन कुमार मुरारका