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Friday, July 27, 2012

दिल ढूँढे क्या

किंचित अस्मिता या जिज्ञासा ही बने  आधार
अनुभूति से शब्द बने,स्वयमेव लय गीत बने
तभी सृजनता के आयाम  से उभरे पैगाम
अनुभव हो रहा है गहरा, संस्कार की अनिवार्य धारा
इस उलझन मे फंसा हुआ था क्या करना कुछ सूझे नहीं ….
हरदम दिल उदास सा रहता ढूँढे क्या था जानूँ नहीं ...

प्यार तुम्हारा पाने को कुछ गीत लिखूँ

प्यार तुम्हारा पाने को, जाने क्या करना होगा
रात से सुबह तक मैं तुमको याद करूँगा
तुम क्षितिज बनो तो बनो सूरज मैं बनुगां
कुछ पंछी रहना चाहे जैसे बंद पिंजरे में
आओ ज़िन्दगी एक बार फिर गले मिल लें
..?किसी ख़ामोश शाम को वो एक पल आया था
आहत मन, विकृत शरीर दुख को तेरा दर याद रहे
मुझे कुन्दन बनने की चाह, तुम हिम का एक कण

सोचता हूँ इस ही पर रोज़ कुछ गीत लिखूँ

सुंदर सा अहसास है ये.....

अकेला चंद्रमा,और सैंकड़ो तारे
खिलते है जब आकाश परे
छाते जगमगाते गुमसुम  सारे
रोशन चंद्रमा, टिम-टिमाते बिचारे
पीड़ा पीकर भी रह जाते हैं तारे
बहस चली तारों के बीच
“चाँद के ही क्यों पीछे तुम,
तारे भी तो सुंदर हैं …..
उनपर क्यूँ नही लिखते तुम, ”
यही बात क्या भूले हम
इतनी सुंदर बात भला,
कलम उठाओ घर जाकर
कविता में इसको ढालो,
सुंदर सा अहसास है ये.....

स्पर्श

यह स्पर्श न अब वो स्पर्श रहा,
यह स्पर्श न अब कुछ स्पर्श रहा …
सच है कवी आपने सच कहा
जीवन की आपाधापी का यह सच रहा...
स्पर्श "जीने का" उस स्पर्श में कंहा
उस "स्पर्श" में ही थी "जीने" की चाह
दोनों "स्पर्श" इस जीवन की है राह
यह स्पर्श  है तब भी तो वो स्पर्श रहा,

हुस्न

हुस्न से बढकर नशे का  न कोई मयखाना,
उड़ गए होश, पर चाहत का नहीं भरा पैमाना
होश-में हुवे मदहोश पर नशे से भरा नहीं मन
तेरे मीठे होटों को पीने को करूँ कितना जतन
टूटे हुवे प्यालों में हाला,पीने को बेबस आता मधुशाला
तेरी जुल्फें,गालों की लाली,होटों का मधुमय प्याला
पीया था कई…कई बार,हुआ नहीं पीने का नशा कम,
जो अब हिस्सा है जीने का पर प्यास अभी हुई कंहा ख़तम
कितनी बार दिल को सहलाया, यांदों के जाम अब आंसुओं से भरे
अभी भी कुछ शेस नहीं, समय की धारा मे जीयें तेरे हुस्न के सहारे
पीकर डगमगाना जरूरी था जीने के लिए,
अब डगमगाता रहता पीने के लिए”.
इसलिए पीने की आदत बुरी जीने के लिए
डगमगाओ मत,ना जरूरी मय जीने के लिए
जिन्दगी ही सुख है, पीना है जीने के लिए ….!
आपके छंद सरिता पीकर मन डगमगाया, पर था सम्हलना
कुछ बताने, या समझने-बिन पीये जाने कैसे होता है डगमगाना
“पी लिया करते हैं जीने की तमन्ना में कभी कभी
डगमगाना भी जरूरी है, सम्हलने के लिए कभी कभी

भगवान बनाम इंसान

भगवान बनाम इंसान

इंसानों के भगवान
दिखते हैं उनकी कल्पनायों से
जीते हैं उनकी श्रद्धा-बिश्वास से
इंसानों के भगवान
सर्वांग -पावन-प्रवीण सुन्दर से
जनम-मरण-रहित सन्तुष्ट से
इंसानों के भगवान
बिवेचक-पालनहार-पुण्यात्मा से
दासानुदास भाव, तुष्ट गुणगान से
इंसानों के भगवान
भगवान की हर रचना इंसानों से
तभी तो-"भगवान" बने इंसानों से
परन्तु.....................!!
भगवान के इन्सान
दिखते है जीते-जागते पर मृत से
जीते-जिन्दगी रंजिश,भेद-भाव से
भगवान के इन्सान
सर्वांग-बनावटी-रूप मे, कुरूप से
मरण मजबूर, जन्मे भी असन्तुष्ट से
भगवान के इन्सान
अबिवेचक,स्वार्थ अपार,कपट- आत्मा से
ऊँचे-अहम् भाव, तुष्ट झूटे गुणगान से
भगवान के इन्सान
इंसानों की हर रचना भगवान से
तभी तो-"इन्सान" बने भगवान से
पर हमें जानना है :--------
इन्सान का है भगवान ?
भगवान का है इन्सान ?........
जब की......
भगवान बनाये हर इन्सान को
बताये पुण्य की राह "उनहे" पाने को
और...?
इन्सान बन खुद आये धरा पे
अपना सच दिखाये इंसानों से

सजन कुमार मुरारका