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Monday, October 1, 2012

मर गया मेरा मन |







 
हाल-फ़िलहाल,
न जाने कियों,    
अंतर्मन के बिचारों को,
मन की जमी मे बोया था,
सोचा था..........,
सुन्दर सा कोई गीत,
गजल, शयरी या कविता,
हंसी का कोई तराना,
अंकुरित होगा फूलों सा,
ख्वाइस थी.........,
महकेगा चित्तवन,
फैलेगी सुगंध,
चहकेंगे हर छंद,
शीतल शोभित बर्णन,
पर कठोर कुंठित मन से,
उपजा हैं काँटों का उपवन |
ह्रदय को करके लहू-लुहान,
तार-तार हो गये,
सहनशीलता के आधार,
मुझे अब अच्छे लगते विरह के गीत,
दर्द भरें शेर और शायरी,
गजल जिस मे हो बिढ़म्बना,
किसी के छलकते नयन |
समभाव से मन मे आता चैन,
हँसते-गुनगुनाते लोग करते बेचैन,
सब कहते........,
मर गया मेरा मन |
मरे हुवे मन की चित्ता की राख़,
सारे शरीर पर मलकर,
मैं "अघोरी" सा......
फिरता यादों के शमशान पर |
हाल-फ़िलहाल,
न जाने कियों ,?
अंतर्मन के बिचारों को,
बंजर खेत मे सीच रहा हूँ,
बात-बेबात !

:-सजन कुमार मुरारका

बूढ़ा पेढ़,



मैं अपने आप को बूढ़े पेढ़ के साथ मिलाकर
सोचता हूँ, कितनी त्रासदी हैं उन बुजुर्गों की
जिन्हें अब बेकार का जंजाल समझा जाता है |
बुजुर्ग को बूढ़े पेढ़ के प्रतीक मे सोचकर देखें.......

XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
मैं बूढ़ा पेढ़,
मुझ मे झुरियां पढ़ चुकी,
कितने अर्सों से यहाँ खड़ा !
गर्मी-सर्दी,सावन -भादो-
हर मौसम को निहारता,
सारे के सारे उतार चड़ाव,
चिलमिलाती धुप सहकर,
दूसरों के लिये छाया बिछाता,
हर राही को ठण्डक दिलाता |
बदलते समय के साथ,
चहरे पर जो मेरे रुबाब था,
अब बदल गया, बूढ़ा हो गया |
कुछ पीली-मुरझाई सी पत्ती,
अध्-सुखी टहनी और झुरियां,
वक़्त के साथ, साथ छोढ़ देती !
हवा के हलके झोंकों से भी,
मेरा कठोर सा तन अब झुर-झुरा,
गर्मी-सर्दी से डर कर रहता सहमा सा,
ठण्ड मुझे अब सताने लगी,
गर्मी मुझे  अब सुखाने लगी,
बरसात अब कर देती पानी-पानी |
हवा के झोके तन मे चुभते,
में जान रहा हूँ में बूढ़ा हो गया !
मेरे रखवाले कहते- "तू गिर जा"
नहीं तो यहाँ से हटाना होगा,
तुझे काट गिरना होगा,
बनेगी नई फुलवारी, नई क्यारी,
वक्त के साथ जमीं से अलग हो जा !
काम आयेगा कुछ आग में जल,
कुछ का बना देंगे नया फर्नीचर,
ओ बूढ़े पेढ़ ! तू समझ, मान जा !
अरे अक्कल के अंधे,
और नहीं तो आंधी मे ही गिर जा,
कितने गिरते हैं हरदिन, बेहया,
कुछ तो शरम कर, और, मर जा |


:- सजन कुमार मुरारका(ए.के.भार्गव की रचना "बूढ़ा पेढ़" के अनुकरण मे )

नजरों से पिलाया गया........!!!




सूरज तो डूब गया रात के इंतजार मे और तन्हा रात आई,
दिल जले,कोफ़्त कैसा, रात बाकी, अभी तो चाँद निकला कंहा !

अभी रात बाकी,अश्रु-जल भर,पलके भीगेंगी सारी-सारी रात,
होश गंवाता नहीं, कब दस्तक दे-दें, कोन जाने दिल की फरियाद |

गम के आंसू पी-पीकर, गम ही हम से पनाह मांगें जालिम !
हमारी दास्ताँ सुन, मयखाने मे प्यालों पर प्याले भरें जाते हैं...!

अजीब हालात है, अब हम मयखाने से भी लोटा दिये जाते हैं,
इल्जाम पीनेवालों का,मेरे गम,उन्हें पुरी बोतल से नशा नहीं देता !!

क्या करें, किस डगर जायें, लेकर दिल मे बिरह की ज्वाला,
साकी रहम कर,तरस मेरी आह पर, पिला दें अंतिम हाला |

यकीनन जीने को जी लेते,महफूज अगर रहें उनके इरादे,
नफरत मे भी डर है,शिकवा करेंगे,  हम तब्बजो नहीं देते !!

जहमत ना उठाते हम पीने की, अगर वह अधरों से न पिलाते,
आँखों के जाम, नजरों से पिलाया गया,नहीं हम कंहा पीते ...?

सजन कुमार मुरारका

ह्रदय में समाई.....!!












तुमने ली जब मद-मस्त अंगढ़ाई...।

हृदय के रुधिर वेग मे फ़ैली पंचम तान
अंग -अंग मे शिहरित ओस का स्नान
पुष्प सा पुष्पित हिल्लोरित प्राण
प्रसन्नता की स्रोत बही शीतल मलय प्रमाण


तुम जब आतुरित मन से लज्जा दिखाई.........।

मेरी सोच का अबरुद्ध द्वार खोलकर
झुकी मदभरी पलकें, निहारती धीरे से छीप-छिपकर
खड़ी हो एकांत, अपने नयन-सीपी में सागर भर
लाई हो अधर प्याले में  मधु अबलम्बन लेकर


तुमने जब प्रिया मिलन की आश लगाई................।
मिलन आतुर खड़ी जैसे "नाइका" मूर्तिमान
उच्छ्वासित श्वासों में बिखरे ,उद्वेलित प्राण
शीतल मलय सम शिहरित मधुर स्पर्श सुजान
समर्पण का सन्देश प्रवाहित करता मौन आह्वान

तुम अब स्पन्दन बन, मेरे ह्रदय में समाई

सजन कुमार मुरारका

चाँद की है क्या मजाल ?......!!!




जब उनकी नज़र जो इनायत हुई हम पर,
                      सब की निगाहों मे मेरा ही वजूद छा गया...!
महफ़िल में आज सब की नजर हम पर,
                     जब से उनकी निगाहों में मेरा चहेरा आ गया,
कल तक तो इस महफ़िल का मैं कोई न था,
                   आज हर शख्स, खुद-व-खुद अपना बना गया,
जंहा कोई परिन्दे का भी नामोनिशाँ न था,
                   लाखों का हुजूम चौखट पर दस्तक बजा गया !!

सब लोग पूछते मुझसे,खुदा का है वास्ता,
            कोन सी चाल बाज़ी या साज़िश मैं रचा गया }|
अब चाँद मेरी महफ़िल मे सरगोशी करता,
                   इल्जाम है मेरे आगोश मे  चाँद आ गया |
ज़ुल्म और नफ़रत का ज़हर हर कोई फैलता,
  जलन से मुहब्बत या,सलीके का लहज़ा बदल गया !
हर ताल्लुकात मे अब सौदा नजर आता,
 कितना लाजमी है हर शख्स-ऐ-आम पास आ गया !!
जाने-जीगर प्यार का दीदार करना चाहता,
        मेरे दरवाजे पर जश्ने ईद सा माहोल्ल छा गया |

सलीक़ेमन्द लोगों का सलीक़ा समझ नहीं आता,
   बदतमीज़ी है ,आसमां के चाँद को दिलकश बताया,
"उनके " हुश्न से उस चाँद को मिलना ही गैरवाजिब था,

  मेरे " चाँद " से बाहार आसमां का खुद ही शरमा गया !

सजन कुमार मुरारका

बयां हुश्न का कर..गजल लिखते हैं....




गहरे जुल्फों में उलझ गये,माना था उन्हें सनम ;
नसीब तो देखो, सोचा था, रहेंगे इनके साये मे,

हुश्न का सहेरा समझा; बादल समझ इतराये  ;
हकीकत मे यह मेरे "जलते" दिल का धुंवा था , !

वहम था लब्बों पर फूलों सी अद्दा है, उनकी मुस्कान;
खंजर सी तेज धारवाला, है जख्म देने का औजार !

कातिलाना मुस्कान अधरों मे,हंसी,उनके चहरे पर ,
देख हाल हमारा," खुशी"छुपती नहीं,जल्लादी शान ;

नयन-कमल का भ्रम,गुंजन करता मन भवंरे सा ;
मधुपान को तरसे हम,घुमे इधर से उधर, सारे क्षण,

पंखुढ़ियों मे फँस, अदाओं से बेहाल,हो कर परेशान;
दीवाना बन,काँटों के जखम लिये, अश्क भीगे नयन;

माना उनकी हर बात अच्छी, पर हासिल हमें जख्म है ;
जिगर पे ज़ख्म,दर्द का एहसास, उनकी याद दिलाता है ;

उन्होंने दिये ज़ख्म, तभी तो बयां हुश्न का कर पाते हैं;
लिखे नहीं दो अल्फाज कभी, अब हम गजल लिख पाते हैं !!


सजन कुमार मुरारका

हैं प्यार में नाकारा......!!!



इल्जाम है हम जिन्दगी मे 
                अब किसी काम के ना रहे,;
क्या जरुरत थी "हुश्न दीदार" 

                        से हमें नाकारा बनाने की !

फुर्सत नहीं,जरुरत नहीं, न इमान भी,
                            किसी और को पाने की ;
तुम रहते हो हरवक्त साथ,

                देख लेते हैं तुम्हे अपनी परछाई मे,

हद हो गई, बहुत हुवा आशियाना, 
                             सोचा उन्हें अब भुला देंगे,
पर जब सामने से गुजर गये, 

                        सोचा  कल होगा दिन आख़री ;

शिकवा था "खुदा" की खुदाई से, 
                   दिल में तुम्हारे ख्यालात जगाने का,
वे-बजह की गफलत, खुद "खुदा"

                     को अचरज है तुम्हारी खूबसूरती से…

भेंट क्या करें तुम  को फूलों का गुलिस्ता
                                 या  खिलते गुलाब की कली
तोहींन हमारी,खुद गुलिस्ता 

                      या खुद गुलाब है जो,वही उन्हें देने की...

अकेला सा महसूस करता, तन्हाई रातों मे,
                                               याद तुम्हे कर लेता हूँ
हर लम्हा खुद-ब-खुद आबाद होता,

                             हुजूम निकलता लाखों चाँद-सितारों का

हाल परवाने सा, शंमा रोशन हुई, 
                               खींचे चले आते,पता अन्जाम मिलन का :
हम तो जीते जी मर गये, 

                         सांसे चलती आपके साहरे, हैं मजबूर-नाकारा !!

सजन कुमार मुरारका