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Thursday, November 15, 2012

"त्रिशूल"......(प्रथम चरण )!!



श्री गुलजार जी की लिखी 'त्रिधारा' ये रचनाए पढ़ी। इस प्रकार की रचना मे तीन चरण होते है। पहले दो चरण एक साथ औए तीसरे चरण से एक नया अर्थ प्राप्त होता है। उनके प्रयास के साथ मुझें भी कुछ लिखने का मन हुवा ।शीर्षक है "त्रिशूल"......(प्रथम चरण )!!

दिल मे बस जाता कोई  जब
नशा इश्क का चढ़ता जब
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पाँव तब ज़मीन पर नहीं पड़ते
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दिन गुज़ारते उम्मीद से ,रातें गुज़रेगी ख्यालों मे
रातें नहीं गुजरती ख्यालों से,इंतज़ार के लम्हों मे

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उढ़ जाने को दिल चाहता  पंख लगा के
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चंपा -चमेली सी ख़ुश्बू से रातों को महकाये
मय -भरी आँख से  ,मिलन का संदेश जताये

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सम्भल ले सपेरा, नागीन कंही डसं न जाये
****************************उमड़ पड़ेअम्बर धरती की प्यास बुझाने
माटी भी महक उठी मिलन स्पर्श बताने

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आया सावन झुमके ;आया सावन झुमके
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भीख के मिले पकवानों से अच्छी मेहनत की रोटी
वोटों की भीख मांग,फीट हो गई नेताजी की गोटी

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,अब पछतायें क्या हो चिड़ियाँ ज़ब चुग गई खेत
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पत्थरों को तराश के बनती हसीन मूरत
दिल को तराश कर सजाई थी तेरी सूरत

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बेवफ़ाई मे खप गईं यादें,जैसे खड़ा ताज़महल
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निर्वाचन हमारे देश मे नाग-पंचमी का त्योहार है
दूध(वोट)हमको इन नागों(नेताओं)को पिलाना होगा
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जान-माल की हिफाज़त ख़ुद को करनी होती है
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सजन कुमार मुरारका

Wednesday, November 14, 2012

प्रेम चिरन्तन एहसास




प्रेम चिरन्तन एहसास 
"प्रेम" का
लब्ज़ ,सदियों से सुनते आये;
हर एक ने समझ लिया,
पर कोई नया अर्थ;
या नया प्रति-शब्द ;
कंहा किसी ने कोई बताया !

"प्रेम " जो,
वक़्त दर वक़्त चला,
हवा बदली,अन्दाज़ बदला;
एक सी साँसों की गति,
जताने की वही विधी,होंठों पर चली,
कंहा किसी ने कोई बदलाव दिखाया!!

"प्रेम" में,
यह ही साबित हुआ,
घटिया/बढ़िया बहाने भी,
कितने मनमोहक लगे,
प्रेमातुर ही जाने;
कंहा किसी ने कोई ऐतराज़ किया!!!

"प्रेम" के,
शब्द या,
ह़र अन्दाज़;
नई लिपि, नई भाषा,
क्या नया महसूस हो पाया  ?
कंहा किसी ने कोई बदलाव किया!!!!

"प्रेम" की,
कविता-पुरानी हो;
या नई या हो जैसी भी,
लगे प्रमिका सिमट आई पास।
रहता है केवल प्रेम"का एहसास,
कंहा कोई बदल पाया कोई परिभाष!!!!!
:सजन कुमार मुरारका

आरजू थी दास्ताँ लिखेंगे.......!!

 
 आरजू थी, मोहब्बत का पैगाम लिखेंगे ;
तन्हाई मे कैसे गुजरी रात वो दास्ताँ लिखेंगे !

ख्वाहिश से भर कर अल्फाज, इल्जाम लिखेंगे,
कसमे-वादे,प्यार-वफ़ा,शिकवे-शिकायत लिखेंगे !!

तमाम रात ख़यालों से सजी हुयी छोटी बढ़ी बातें,
दर्द से गर्क़, दहन से सुर्ख, हर अल्फाज सजा के ;

निद्राहीन आँखें ,आँखों की पुतलियों मे नींद जागे !
भटकी हुई रुहु की माफीक मुक्ती की पन्हा मागें |


लहू सा तपता सूरज निकला अम्बर मे ले उज्जाला ;
मसल दिया सारे ख्वाब,मन मे तृष्णा का अंगार जला !!


बंद कर लेते अपने होंट, मगर दिल से दर्द है निकला ;
खुदा का शुक्र है ! अभी तल्लक मेरा जनाजा न निकला |


:-सजन कुमार मुरारका

धढ़के- यादे बन उन के दिल मे !!!

 
 
पथ्थर की चट्टानों को चीर कर निकलता है दरिया,
सनम पथ्थर दिल से "आह" की भी है खामोशिया,

समंदर से मिलने को बेताब दरिया दौढ़ लगाती ;
मेरी जान की दुश्मन, पास से उठकर चली जाती,

समंदर मे भी चाँद के आकर्षण से ज्वार- भाटा आता,
ऐसी क्या रुश्बाईयां, वह पर्दा नहीं ह्ठाती  खिढ़की का |

पर्दा-नशीं थे नहीं वह, हुश्न की चर्चा सरे बाजार होती है ;
सरेआम महफील मे उनका जलवा कत्ले-आम मचाता है !

कत्तल भी हो जायें,  रजो-गम नहीं,   दीदार तो होता है ,
अफ़सोस किसी भी दौर का नहीं,यादें दीदार की महफूज है ;

मेरे दिलवर की शोख़ी,खिलती कलियों की नक्श- पहचान है,
रहम-ऐ-अदब का तकाजा, उनकी सादगी कलियों को बख्शा है ;

सादगी की यह मूरत, फूलों सी मासूमियत का नाकव पहेने है ;
लरज़ता दिल,रंगीनियाँ छुपी है सीने के अन्दर, मेरा दिलवर है !

मासूमियत की सादगी से, वह जहेन में फरेब का नश्तर चलाती ,
मुहब्बत की सर्द चट्टानों को पिघला कर आग का समंदर बनाती ;

हक़ीक़त में बियोग कि आग, बर्फ बनके, चोट पर लगा रही मरहम !
जिस्म के अन्दर पिघल रही बर्फ, अश्क बन, बहती रहती है हरदम |

नफरत न होना बुज़दिली की बात नहीं, न है कोई शिकवा वेबफाई से,
मालूम मुझे खोखली दीवाल पर टीका यह बेरुखी का किल्ला वहम से ,

कितने अर्स काबीज रखेगी वह जिद्द खुद के बेकाबू दिल की धढ़कन पे ,
हमारी भी जिद्द है, मरते दम तक, यों ही धढ़के- यादे बन उन के दिल मे |

सजन कुमार मुरारका

जिन्दगी का फ़लसफ़ा




"प्यार" ही जिन्दगी का शायद सही फ़लसफ़ा है ;
जो हर एक " जिंदादिल"  जिन्दगी  में  बसता है ;

वैसे चाहे, कोई अकेला भी जीने को, जी लेता है !
वीराने मे खिले- गुलबहार,वह कोई खिलना है ?

किसी के दिल में पनाह पाये,यह हमारी आरजू है ;
किसी के होंटों की मुस्कुराहट बने यह अरमान है ;

हम ना रहे, पर हमे याद मे रहने की चाहत है !
फरियाद करेंगे वह किस से, जब दिल टूटता है ,

कहते जो हमारे लिये उनके पास वक़्त नहीं है ;
खोजेंगे हमे,वक़त आने पर,यह हमारा वादा है !

मोजुदगी नहीं, होने का एहसास ही  खास है ;
दिल की नजर से देखिये, हम आपके पास है |
सजन कुमार मुरारका

अजन्मी कन्या का सवाल





मैं जन्म की चाहत में, तू ले आई"माँ"तेरी कोख मे,
बुलाया आपने प्यार से, किसी मिलन के क्षण मे;
परमपिता ने वरदान समझ भेजा- ममता के आँचल मे;
नफरत मुझसे क्यों ? आई नहीं बात समझ मे ;
सृष्टि अब भावी-सृष्टि पर,लिप्त कैसे अत्यचार मे ?
प्रति-पालक पिता क्या कर मग्न हुवे संहार मे ,
तेरे तन का लहू पुकारता तुझे जीने की आस मे ;
हत्यारे सोचो ' ध्यानसे'  तुम आये कैसे जग मे ?
मैं हूँ जग का आधार, मेरा निवास हर जननी मे |
फिर वह घातक रहते कैसे ,धरती माँ की गोद मे !
कैसा अनुराग है निष्ठुर" मात-पिता" का संतान मे,
कन्या या पुत्र का सृजन तो है उनके अधिकार मे ;
अपने किये का दंड,अजन्मी कन्या को अकारण मे,
तुम्हारा खून रहम मागें,असहाय लाचार अवस्था मे,
कब तलक पाप होग परम्परा,बंस-बेल की आढ़ मे,
तुम जरा इन्सान बनो, मत खो इन्सानियत, हैवानी मे !

सजन कुमार मुरारका

कथा मेरे जीवन की !

 अजाचित नियति से भाग्य मे जो दुख खिला,
संचित पीड़ा का अनचाहा उपहार जब मिला;
तढ़प गया हृदय, शांत रहता कैसे अकेला ?
सोचा,जीने की उमंग,प्रेम,शांति होती क्या बला !
कैसे कह दूँ,यह भी व्यर्थ ही सा था सिलसिला ;
प्रयाप्त तृष्णा मे शुष्क कंठ से अपना लहु पीकर,
अतृप्ती की ज्वाला मे जलता रहा जीवन स्तर,
चिंतनशील भविष्यत के अंधियारे से घबड़ाकर-
अपनो से थोड़ी सी रोशनी माँगी उम्मीद कर;
मेरी रिक्त अंजली मे रख दिये ज्वलन्त अंगारे भर ।
कहा, यह परम सत्य है,तुम सक्ष्यम हो जीने मे  ,
तुममें और औरों के गुणों में भेद नहीं कोई दृष्टी से,
धरा-व्योम मे चलकर,अदृश्य लोक से मनुज आते,
अर्थ खोजने जीवन का निज भाग्य रश्मि रज्जु से,
अकेले आते,अकेले चले जाते,चिराचरित नियम मे;
अकारण रोना-धोना छोड़ो,नई कोई नहीं रीत जग की,
हर हाल से ,जीवन चल जाता,जैसे तैसे योंही-कंही ।
यातनाओं को सहने की आद्त सीखो ,जीते हैं वही,
जीना है तो सहिष्णुता और धर्य से बात बनेगी  सही;
तभी,सहकर भी जी रहे,छूटे न जीने का लय, कभी,
मृत कोशिकायों मे अनुताप लिये,कथा मेरे जीवन की !
जब भी मन अशांत हुआ,बिछाता सेज कांटों की,
मगर आज मरी हुई  लालसा क्यों  प्रखर हो उठी !
क्यों कह रही,रह-रहकर, दबी-दबी,लुकी–लुकी सी ,
डूबते-जीवन की करुण कहानी,सुनने क्यों आयेगा कोई ?

:-सजन कुमार मुरारका