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Thursday, November 15, 2012

खोया हुवा दिल



आज अचानक बहुत दिन बाद,
मुलाकात हो गई;
मेरे खोये हुवे दिल से,
काफ़ी दिन से गुमशुदा था ।

कितनी मिन्नत,कितनी फ़रियाद,
खोजने  की हद हो गई;
पूछा हाल-चाल दिल से,
क्यों इतने अर्सेसे वह मुझ से ज़ुदा था ।

आँखों मे भर पानी,सुनाया संवाद ,
प्यार की इन्तिहां हो गई;
प्यार किसी से हो गया था उसे ,
नासमझ दिल कब उसी मे खो गया था  ।

जर्जर, मासुम से चहरे पर अवसाद,
जीने की तमन्ना खत्म हो गई;
टूटे हुवे दिल को सम्भालु कैसे,
"दिल्लगी" को उसने "दिल की लगी" समझा था ।

समुन्दर की रेत पर लिखा होता बरवाद,
लहरें आई और धो गई;
रेत का दोष इसमे कैसे,
नदानी थी दिल की,ग़लत जगह लिख था।

दिल को वापस लाने की थी कबायद,
अब जरूरत बड़ी हो गई ;
जीने को जी लेते लोग जैसे-तैसे,
पर रेगिस्थान मे वेवकुफ़ पानी खोज रहा था ।

सजन कुमार मुरारका

बोलो जब सोचकर बोलो !!



सुनो भाई साधो,कहते गुणी जन, हमको समझाय;
बोलो वचन मधुर ऐसे; जो मन को शीतल सुहाय,
कभी ना बोलो कड़वे बोल, अंतर्मन को बिंध जाय,
ज़ख़्म लगा तलवार से फिर भी उपचार किया जाय,
बातों के ज़ख़्म का "वैद्य धन्वन्तरि' न कर सके उपाय,
कभी भी  किसी का दिल दियो ना  अकारण दुखाय ,
मन टूटे  एक बार,लाख यत्न करो फिर जुड़ न पाय,
जुड़े भी जो दाग रहे,जीवन भर दिल मे बसा रह जाय ;
सदा मूर्खों ने फ़िज़ूल की बातों से दिया कोहराम मचाय ,
कह गये लोग पुराने,टक्का दे चाहे, उससे पीछा लो छुड़ाय,
ज्ञान की बातें उनके समझ न आय,व्यर्थ समय क्यों गवायें,
जैसे की सच है ,भैंस के आगे वीण बजाय, भैंस बेठी पगुराय ; 
मूर्ख सखा से नहीं होता भला ,बुद्धीमान दुश्मन ही रखा जाय !
मुर्ख सदा दु:ख ही बांटे, बबुल जंहा उगे,संग कांटे उपजाय,
सरसता दे रिश्तों मे, प्रेम प्यार के बोल से जो जीवन बिताय,
कस्ट आये जब भी,  मिल बाटकर ,अपने आप कट जाय !
अपनों का तिरस्कार करे, जो अपने अभिमान मे बोले जाय ,
अहंकारी का विनाश ख़ुद प्रभु ने किया, फिर उसे कोन बचाय ?
अपनों का अपमान से, मन की ज्वाला विवेक को भष्म कर जाय,
पता नहीं कब खोल दें ,अपमानित घर का भेद,विनाश दें  कराय !
बोलो जब भी सोचकर बोलो,मीठा बोलो,दूजा न कोई सरल उपाय,
ज्ञानीजन कहतें; गूंगे के दुश्मन कम होत,क्यों की वह बोल न पाय,
"सजन" ताहे कहे ,ऐसे वचन बोले,जो किसी का दिल ना दुखाय !
*सजन कुमार मुरारका *

हम नहीं पीते यों ही .....!!!?!!!



मुझे शक की निगाहों से ना देखो,मैंने पीना छोड़ दिया,

यों ही आँखें लाल हो गई ज़ालिम, तुम ने जो ज़ख्म दिया ,

मेरी गली आना,देखना ,तेरे नशे ने मुझे  बे-होश कर दिया,

जबसे ज़ुद्दा हुई  तुम,हमने तो मयखाने जाना  छोड़ दिया;

कितने पियें ज़ाम,ह़र नशा,तेरी यादों से कफुर हो लिया |

मेरा रुख मोड़ने की कुरवत मे,तुने मेरा साथ छोड़ दिया,

रहने लगी ख़फा-ख़फा जब से,मयखाना  ही छोड़ दिया,

लबों को सिल के भी, साकी से नज़रें मिलाना छोड़ दिया.

मोहब्बतकी आयतों को सनम,ख़ुदा-ऐ पाक का दर्ज़ा दिया |

फिर भी नजरें न हुई इनायत,हमने ग़म से दामन जोड़ लिया,

तेरी आँखों से नफ़रत का उलहाना,हर बाज़ी को डुबो दिया

शराब की थी नहीं इतनी औकात,तुम ने ही मदहोश कर दिया,

जब से हारी तेरे प्यार की बाज़ी,दिल ने जीना मुहाल कर दिया,

प्यार की तपिश का गुमान ,बेवफाई ने हाल बे-हाल कर दिया |

इतने पर भी जब दिखी बेरुखी,हमने प्यार मे इठलाना छोड़ दिया,

क़सम ख़ुदा की हम पीने के लिये अब  मयखाने जाना छोड़ दिया,

हम तो चले जाते यह सोचकर, कंही,तुमने वहां हमे तलाश किया,

हम पीते नहीं जानम,वक़्त तुम्हारे इन्तज़ार का यों हल्का किया |

नाशा छोडा,तुम छोड़ गई ,सोचते तुम लोटोगी,जो नशा लोटा दिया,

मैं तेरे हुश्न के गरूर से नशा किया,एतराज़ न जाने तूने क्यों किया,

तुझ पर एतवार करके, ग़म का, ज़िन्दगी भर दिल पर ज़ख्म लिया,

ग़म ग़लत करने अगर अब हम पी लेते हैं तो, क्या ग़लत किया ?!!!

*सजन कुमार मुरारका *

त्रिशूल ....(तृतीय चरण ),,,!!!



त्रिशूल ....(तृतीय चरण ),,,!!!

हुश्न के ज़लवे पर इतना न तुम  इतराव 
चमक दो दिन की,वक़्त रहते संभल जाव

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आईना हुश्ने-जिस्म की खुबशुरती बयां करता है
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मेरे जज़्बात की कद्र कंहा,हर रोज़ यों ही दम तोड़ते
परवाह भला उन्हें क्यों, वह तो मोहब्बत का कारोबार करते
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शायर ही ना होते ग़र इश्क मे बेवफाई का हुनर ना होता
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चोट अब भी लगती पर दर्द होता नहीं
चेतना तो मर  गई पर जिस्म मारा नहीं

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हुक्मरानों की सियासत ने हमें बाँट रखा है
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रास्ते का पत्थर,मन्दिर पहुंचा,प्रभु का दर्जा मिला
ठोकर मारने वाले ,आते जाते सज़दा करते,अन्ध-बिस्वास का भला

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धर्म के नित नये ठेकेदार ;लूट रहें दुनिया सारी
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किसी के दर्द को बांटना हो तो,दिल मे उतर कर देखो
भर के बांहों मे,उसकी आँखों मे खुद की औकात देखो
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दर्द की ग़ज़ल उम्दा होती,दिल की लगन जब लगती
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कुछ सोच मे बदलाव चाहिये इन्कलाब के लिये
बर्फ बने दिलों मे ज्वालामुखी सा रिसाव चाहिये

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मौनम सन्मति लक्षणम,अत: जो सहे वह मरे
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अब रिश्तों का मुल्यायन होता  स्वार्थ के बाज़ार मे
बिचित्र गणित,सास-श्वशुर बदल जाते मात-पिता मे

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तरक्की के दौर मे प्यार भी व्यापार नज़र आता है
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सजन कुमार मुरारका

गांधीवाद !!!



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गांधी जी के तीन वचन अनमोल;
बुरा न सुन,बुरा न देख,बुरा न बोल,
शायद इन्सानियत हो गई अपने मे लिप्त,
बचने बचाने को बन गया गांधी भक्त ,
और उपदेश को ध्यान से रखता सशक्त |
@@@@@@@@@@@@@@हर तरफ़ आवाज़ है कितनी घनघोर ,
सत्ता के गलियारे मे घूम रहे चोर ;
महंगाई की मार,हाहाकार पुरज़ोर ,
फ़रियाद सुननेवालों मे भी घुसखोर ,
मैं कंहा सुनता यह सारे के सारे शोर !!

@@@@@@@@@@@@@@@जितना भी हो दुराचार, भ्रस्टाचार,
सत्ता का हो दुरउपयोग, दूरव्यवहार ,
नारीयों से चाहे व्येबिचार,बलात्कार ,
बहुवलीयों की सरकार या अत्याचार,
मैं कंहा देखता हूँ,रहता निर्बिकार !!

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संविधान ने दिया जो अधिकार बेमोल;
स्वाधीन भारत मे मन खोलकर बोल,
प्रतिवाद की आवाज़ क्यों हो गई सुप्त ;
रोटी,कपड़ा और मकान का दर्द संतप्त ;
आतुरता मे बोलना बन्ध,शब्द हो गये लुप्त |

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गांधी जी के उपदेश के सब  मोहरे थे बंदर !
क्या हुवा आज़ भी नेता अगर बनाते हमे बंदर |
गांधीजी ने भलाई बताने बंदर को बनाया मोहरा ,
आजके नेता चाहते अपनी भलाई, बनाते मोहरा ;
गांधी के नाम पर दुकान चलाते,झूट का सहारा |

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जीवन की ह़र बाज़ी मे आम आदमी से  धोखा,
ज़ुल्म का हश्र बुरा, इतिहास का लेखा जोखा ;
बंदर नाच नचानेवालों सुनो विद्रोह दस्तक देगा,
देखो चेतना के नवउदय की झिलमिलाती रेखा !
बोलो तुम्हारे ज़ुल्म का हिसाब और कोन  देगा ?!

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सजन कुमार मुरारका

"त्रिशूल"......(द्वितीय चरण)..!!!



"त्रिशूल"......(द्वितीय चरण)..!!!

क़ुदरत का बड़ा अज़ुबा,हर इन्सान को जन्मती औरत
इन्सान का बड़ा अज़ुबा,इन्सानों के हाथ मरती औरत
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कुदरत भी अचरज़ मे- इन्सान बनाया,बन गया शैतान
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खंज़र से लगा ज़ख्म फिर भी भर जाता
ज़ुबां से लगा ज़ख़्म कभी भर नहीं पाता
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बोलो जब भी, बोलो मीठा बोल
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मुल्क की हिफाज़त थी जिन के नाम
उन्हों ने ही किया इसका काम तमाम
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चोर  के हाथों मे दिया चाबी थमाय
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ख़ुशी के लम्हों मे आंसू निकल आते
ग़म की बात ही क्या, आसूं तो बहते
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आसुंओं पर न जाओ,इनकी अलग सी दास्तां
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बड़ी मुद्द्त से चाह थी कोई दिलरुबा मिले
मिले भी तो सनम,बड़े ही वह  बेवफा  मिले
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प्यार को असर अब दिल मे नासूर सा बसता
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पेट की भूख सब से बड़ी बीमारी और लाचारी
धर्म,इमान कुच्छ भी नहीं बचे,पड़े सब से भारी
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भूखे पेट भजन ना होये नन्दलाला
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आजका मज़नू,भटकता हुआ भंवरा, कुच्छ आवारा,
कली-कली की चाहत,पर काँटों से उलझता बेचारा
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परवाने जल जाते यों ही शमा के खातीर
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महबूब को पाकर, ख़ुशी मे ज़िन्दा थे बेमिसाल
उनको खोकर भी ज़िन्दा हैं लाश सारीका हाल
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उनको पाने को जीते थे,अब भी पाने को जीते हैं
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सजन कुमार मुरारका

माँ



सपनो मे , खयालो मे,
किस्सों मे, यादो मे,
देखा तुमने खुद को मुझ मे,
अपने हर उन लम्हों मे,
उन एक एक मुश्किल पलो मे,
उतारा मुझे इस जहाँ मे !

खुदा को लाख लाख शुक्र भेजें,
आँखे खोल कर जो देखा तुझें,
उसने भेजा तुम्हारी गोद में मुझे,
भेंट दिया, तुम्हारा ही हिस्सा तुम्हे,
एक नन्ही सी जान को प्राण सीचें,
तुम्हारे दिल का हिस्सा मिला मुझे !

एक नयी कहानी को जन्म दिया,
तुम्हारे ही नैन नक्श है दिया,
प्यार करना तुमने सिखाया,
जीवन का अर्थ समझाया,
दुनिया में आने से पहले बताया,
सारा संसार तुमने दिखाया !

परियों की कहानी सुनाये,
राजा के किस्से बताये,
खेल खेल में पाठ पढ़ाये,
जीवन के सारे रंग दिखाये
अपने हाथो से खाना खिलाये,
 हरबार कितना प्यार जताये !

सारे घर में पकड़म-पकड़ाइ,
जब निवाला मुह मे न डाल पाइ,
चोट मुझे लगने पर तेरी रुलाइ,
खून निकलने पर यों पथ्थराइ,
तुम्हारी आँखों ने वह बात बताइ,
जो शब्दों में कभी उतर ना पाइ,

क्या होती है माँ--!!
आज तक यह समझ ना आया,
रिश्ता बड़ा अजीब,गहरी दास्ताँ;
पता नहीं भगवान ने कैसे बनाया,
इतना दुःख दिया मैंने तुझे मेरी माँ;
सब सहा, और ख़ामोशी से निभाया !

मेरी सबसे अच्छी दोस्त बनी,
मेरा मार्गदर्शन हो;
हर डगर में सहारा तुम बनी,
जीवन का  हिस्सा हो;
मेरी उदासी तेरा दर्द बनी,
ममता से मजबूर  हो;

घड़ी दो घड़ी की बात नहीं यह,
जीवन भर का साथ है यह,
माँ, तुम्ही से सब कुछ है यह,
नहीं तो जीवन ही  व्यर्थ है यह,
कहकर कैसे समझाये यह,
हर इबादत से परे यह !!
सजन कुमार मुरारका