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Thursday, May 14, 2015

लगे अन्दर कुछ खिसके धीरे से
दिमाग जब सुलगता गुस्से से
क्रोध का नतीजा अफ़सोस से
रोकिये इसे अपनी सूझ-बुझ से
जब होता कोई अवसाद मन में
परेशानिया रोजमरा जिन्दगी में
सूझे न आसन राह सुलझाने में
जवाब इसका मिले शांती-धैर्य में
अन्दर कुछ उछले जोर से
दिल जब महकता खुशी से
संतुस्टी का नतीजा गुमान से
रोकिये इसे सोच-समझ से
जब होता फैसला जल्दबाजी में
बिन अन्जाम भले और बुरे में
पछताये जब डोर नहीं हाथों में
जवाब इसका मिले पहले सोच में
अन्दर कुछ होता चेतना से
मन जब कहता आत्मग्लानी से
किये का नतीजा जाने-अनजाने से
रोकिये कदम फिर इसे दोहराने से


 सजन
दर्दे-ऐ-दिल बताना है
खुद की बेरुखी पर
वह अगर एक बूंद आंसू बहाते
कसम खुदा की
हम गम का सागर पी जाते

खुद की वेवफाई पर
वह अगर एक "आह" जताते
कसम खुदा की
हम शर-शैया पर भी लेट जाते
खुद की अनदेखी पर
वह अगर एक नज़र नजराते
कसम खुदा की
हम मरते दम तक राह तकाते
खुद के जुल्मी सितम पर
वह अगर एक अफ़सोस जताते
कसम खुदा की
हम आग के दरिया में कूद जाते
मेरा जूनून नहीं,मेरा सरुर है
ना माकूल इम्तिहान,अब्बल आना है
पाने का सवाल नहीं, अपना बनाना है
शिकायत उनसे नहीं,दर्दे-ऐ-दिल बताना है
 सजन
नारी की छबी न्यारी
शीतल वचन, कोमल मन, स्नेह सुख परिभाषी
मंगल मूरत, नित सेवत, सत चित, प्रकृती से दासी
निसदिन सेवत, प्रेम सहित डोलत,करत सुखराशी
कबंहूँ नहीं मांगत, न कबंहूँ कठोर संकल्प फरमासी

करुनामय,रसमय, लछमी रूपा आनंद सुधा बरसाती
कोयल सी कुंजन करत, तितली सी मंडराती
सृष्टि की अधिकारी, सेवक मान, जग में जी पाती
कल्पतरु सी दाता,अपने दुःख अपने में समाती
कुंठित,भयभीत, लज्जित सा जीवन परे
मात-पिता,अग्रज-अनुज सब अनुशासित करे
जान कष्ट, शांत भाव-सदा ही धीरज धरे
विचित्र रचना, भ्रमित माया जगने रच राखी
पराया धन ठहराये, जो धन दुःख में सहभागी
करे भेद-भाव, सब बिधि, अबिवेक-अबिचारी
न जानत, जननी रूप नारी की छबी न्यारी

 सजन
यूँ भी क्या कम ग़म थे
दामन में हमारे
ज़िन्दगी गुज़ार लेंगे
तुम्हारे यादों के सहारे....
इस कशीश में जो जलन है
मेरी चाहत का प्रतिफलन है
अब चाहे जिन्दगी दे या मौत
ज़िन्दगी गुज़ार लेंगे
तुम्हारे यादों के सहारे....



 सजन
यादो के झुरमुट से कोई पत्ता,
उड़ते हुवे आया;
उस पर कुछ धुल जमी थी,
मन है कि मचल पड़ा!
पुरानी स्मृतिया,
आतुर आँख देखे उसे,
न जाने कैसी कैसी याद,
घुमे नज़र मे दिन पुराने,
एक दुसरे का साथ निभाना!
जीने-मरने की कसम,
घर बसाने का सपना,
जानना चाहता कि-
बिछड़ने के बाद,
क्या था जो जोड़े रखा हमे|
मन आज भी तड़पता,
अकेले होकर कभी कभी,
सब के बीच तलाश करता!
पुराने दिन कि -
अटखेलियाँ करती परेशान,
रिमझिम बारिस मे भीगना!
कानो मे गुनगुनाये पैजनीया,
खिलखिलाना,हँसना-हंसाना!
और कितनी कितनी बातें,
लिपट पड़ती बांहों में,
बच नहीं सकता उस से,
अनगिनत प्रश्न-सताये,
यादें सिकुड़ कर,
सिमट कर दिल मे,
साथ रहती परछाईं सी!
कब किस बहाने उसका,
धुँध सा फैलाव,फैलता मन मे!
मैं हैरान निगाहों से देखता;
यादो के झुरमुट से कोई पत्ता!!


 सजन
पड़े-पड़े ,गुमसुम से चुप-चाप
बीते हुवे कल में खो कर,
सोच में ढूंढता हूँ अपने अछे-बुरे दिन
ऊब-से, किसी-किसी मौके पे
केवल कुरेद लिया करता हूँ अपने-आप
दूर-दूर तक एक धुंधलापन छा जाता,
सहसा सोच की आंधी झकझोर जाती
अपने मन के आईने के सामने,
आदमखोर सी खुद की आकृतियां
और हिंसक पशुता सी स्वार्थ की लालसा
अधिक गहरा जाता बेशर्मी का तमाशा
बजता बिगुल अंतर्मन में, फिर खामोशी-सी,
सोच,कांप कर सिहर-सिहर जाता ।
अच्छाई-बुराई और विवेक की लढ़ाई
क्या जाने क्या सोच अचानक रुक जाता
चढा कोहिनी,हाथ पैर घुमाकर अपनी बुद्धी से
अधीर हो जाता हूँ सब कुछ सही ठहराने
धब्बे पडते हुए चरित्र में, झूठ की चादर
अपनी थाह नाप कर,समझने=समझाने
लौट जाता हूँ वापस, वही राह में,
यह बदनुमा दाग, पेढ़ के तने जैसा बस रह जाता -
खुला विवेक और मन सूना-सूना सा
पानी=पानी होकर, निश्चुप, विवश
वापस चतुर दिमाग से हार जाता
अब रात आ गई, ठंडी हवा हो गई -
मौन था, मन भटक रहा था!
यादों के विशाल बरगद की छाया थी,मैं था,
आगे से अनजान,समेटे हुए मेरे अतीत ,
मैं इस अंतरद्वन्द को गहराई में जाकर
खोज निकाल करूँगा उसे जरुर बाहर


 सजन
प्यारा बंधन
हम दोनों यारों मे
.............................गरम चाय
स्पर्श भावों के
रोमांच शरीर पे
.............................वाष्पित चाय

लिखे लेख से
एक ही विचार मे
............................अनुप्त चाय
मन तृप्ती से
प्रशन्न चहरे से
............................ठंडाई चाय
ठंडी चुप्पी पे
तूफान ह्रदय के
..............................छलकी चाय
हम साथ मे
लगन चिन्तन से
.............................फिरसे चाय
ठंडी रातो मे
हम दोनों साथ मे
.............................गरम चाय

 सजन