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Thursday, May 14, 2015

खोखली ही चाहे उल्फतें, कुछ मगजमारी कीजिये;
इक नज़्म "मोहब्बत" की गम मिटाने को कीजिये;
दर्दे-ए-बयाँ हक़ीकत खुल कर मुँह जबानी कीजिये;
सोचिये कुछ,भरिये आहेँ,प्यारी-प्यारी बात कीजिये;
मसला ज़ज़्बात का हल-कोशीश-ए-अंज़ाम कीजिये;
पत्थरों के शहर में महफूज़ रखना,इंतज़ाम कीजिये;
कांच से ज़ज़्बात,जज़्बा हो हिफ़ाज़त पत्थरों मे कीजिये
खेले ज़ज़्बात से,मुस्करा के,खौफ़ की बजह तो कीजिये
वेबजह सही कुछ मेहरबानी ग़ुरबत को मिटाने कीजिये


 सजन
नज़रों से बचे, नज़रें मिलाकर,नज़रें चुराकर करे इशारा,
नज़रों से गिरे,नज़रें उठाये,नज़र से नज़र का खेल सारा

 सजन
सभी समस्याओं के सुन्दरता पूर्वक समाधान "हम" में निहित है।
सभी समस्याओं के सुन्दरता पूर्वक "अ"समाधान "अ ""हम" में निहित है।

 सजन
रोक नहीं सकती बधाये उन का रास्ता
जब लगन और ,है,सिर्फ मंजिल से वास्ता

 सजन
भोर की लाली छाई,स्वर्णिम आभा का प्रकाश,
ली तुमने अब अंगड़ाई,अधखुली नींद का आभास,
यह उलझे बालों की लटे, मनमें महके सुवास
मिलन के मधुरिम पल, चाहत में चातक सी आश
कंपते अधरों में प्रेम-रस की अनबुझी प्यास
तृप्ती से अतृप्त तन में देह-गंध का मदहोश वास
झरते पसीनो की बूंदों में सिंगार का उल्लास
सिहरीत लज्जावती बेल का सुखद नागपाश
इन्द्र-धनुष सा सतरंगी मिलन का सहवास
झिम-झिम सा बरसता "प्यार" जैसे मधुमास
धीमि-धीमि सांसो में तेज आंधी का बिकास
तूफान उठा हो जैसे रप्तारों में बिखरे श्वांस
पाने की ज्वाला में सर्वस्व देने का अभिलाष
समर्पण और मिलन का है मौन यह परिभाष


 सजन
कचनार से अधर पर जैसे फूलों का रस गया हो ठहर,
लाली उसमे जैसे रसमय दाने फैलाए फ़ैली हो अनार ;
सीपों मे बंद मोती से नयन, काज़ल से बचे जो नज़र !
नाजुकता भरा स्पर्श,गोरी गोरी बाँहों से करे प्रेम पुकार


 सजन
बेजान सूनी आँखें, सुख गये आँसू,नज़र धुँधलाते
दाँत कसकर भींचे, "वे" भूख को अंतढ़ीयों में दबाते
"वे" देते अभिशाप उस ख़ुदा को जिस कारन "वे" रोते
भूख से मरते,और आसमान तले जाड़ों में खुले सोते
उम्मीदें बाँध, दुआएँ कीं, पुकारा व्यर्थ ही सोते-जागते
"वो" करे उपहास,बढ़ाया दर्द-पिछले पाप का फल बताते
ग़रीब-दुखियों के दुख को सुनमें उबासियाँ "वो " लेते
हमारे"वो" "पांच-सितारा" में शान से बर्गर-पिज्जा खाते
भूख किया है ? हमारे "वो" अगर तरीके से जान-जाते
दुष्टता-बुराई ही है पनपी "उनमे", नैतिकता को मिटाते
दिन-रात चुन रहे सर्वनाश, अपने "वो" अभिशाप जुटाते
पाप-पुण्य की माने तो "वो" गन्दगी-खोर कीड़े से मुटाते
बजा रहे हैं द्वन्द का बिगुल अपने "वो" असमानता फैलाते
भूख किया है, हमारे "वो" अगर तरीके से जान-जाते ?


 सजन