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Sunday, September 9, 2012

कन्या-जनम



पुत्र जनम शुभ, कन्या जनम कष्टकारी, 
करे भेद-भाव, सब बिधि, अबिवेक-अबिचारी
न जानत, जननी रूप कन्या की छबी न्यारी
ध्यान दीजे, संतान सकल, सम प्रेम अधिकारी

शीतल वचन, कोमल मन, स्नेह सुख परिभाषी
मंगल मूरत, नित सेवत, सत चित, प्रकृती से दासी
निसदिन बोलत, प्रेम सहित डोलत,धरत सुखराशी
कबंहूँ नहीं मांगत, न कबंहूँ कठोर संकल्प फरमासी

करुनामय,रसमय, लछमी रूपा आनंद सुधा बरसाती
कोयल सी कुंजन करत, तितली सी मंडराती
सृष्टि की अधिकारी, सेवक मान, जग में जी पाती
कल्पतरु सी दाता,अपने दुःख अपने में समाती

कुंठित,भयभीत, लज्जित सा जीवन परे
मात-पिता,अग्रज-अनुज सब अनुशासित करे
जान कष्ट, शांत भाव-सदा ही धीरज धरे
प्रतिपालक जननी तू जब संतान रूप धरे

विचित्र रचना, भ्रमित माया जगने रच राखी
पराया धन ठहराये, जो धन दुःख में सहभागी
कन्या-दान अति महान कहे सब अनुरागी
फिर भी मांगे धन-दौलत, कन्या बिचारी अभागी

:-सजन कुमार मुरारका

समय के साथ चले



समय के साथ चले

सुख, दुःख, प्यार और जलन


यह दौर कब तक झेले


ख़ुद में मगन, वक़्त कैसे निकले


अपने किये  जुल़्म खुद पर


फिर भी चुप, कुछ नहीं बोले


देखना था ये  कब तक चले।


कोशिशें तो थी खत्म करने की


क़िस्मत से हल नहीं निकले


अधूरी ख्वाइस, सपने, वादे


उम्मीद के साथ ज़िन्दा रहते


कोई सचाई या कोई यादे


सच के लिबास में सजा झूठ


क्या सही, क्या गलत,


ये वक्त़  खुद तय करे


वाजिब था या गैरवाजिब


बस जिन्दगी जिये या मरे


समय की पाठशाला में उम्र भर


सफलता पाने के सहारे


पत्थर बना खड़ा ही रह गया


और मंजिल से मंजिल भटक


नासमझ दूर तक चलता रहा


जिस्म पर उम्र की परछाई


बालों में सफेदी की चमक


आँखों से ओउझिल राहें


फिर भी हताश नहीं,


नाउम्मीद कियों भले


जो सही माना मन में


और समय के साथ चले



:-सजन कुमार मुरारका

Saturday, September 8, 2012

मेघदूत



है मेघदूत
जब विरह- स्मृत-कर
श्रावन का हर दिन,
विरही के शोक से
सघन संगीत में पुंजीभूत
व्याकुलता में छिपा दर्द
अवरुद्ध अश्रुजल सिक्त कर
ताम्ब्र-कृष्ण अम्बर पर,
न जाने, कितने झंझावत
विद्युत--उत्सव से करबद्ध
हवा का तांडव दिखा कर
अंतरगूढ़-क्रन्दन से भर
प्रतिध्वनित अश्रुवाष्पयुक्त
अविरल रूप से झर  कर
नई जल-धारा बरसाकर
है मेघदूत
स्निग्ध, शीतल, स्नेहयुक्त
सागर में मिलन प्रतिबद्ध
विरह और मिलन के क्षण
एकाकार और समर्पण पूर्ण कर
देश-देशांतर में खोज कर
हर दूर प्रवासी विरही में
मिलन का सन्देश अभीसिक्त
तुम विरह से निर्मुक्त
नया जीवन संचरित कर
मेघ तुम धरा में बरस के समाते हो
तब-तुम "मेघ दूत" कहलाते हो

:-सजन कुमार मुरारका
(नोट :मेघदूत  काब्य से प्रभावित कुछ उद्गार)

वह और उनकी तस्वीर



तस्वीर से करते दीदार
वह बैठे मेरे पास ?
तस्वीर करे ना परिहास,
उनके नजर में उपहास-
मन को करता उदास,
तस्वीर से बुझे नजर की प्यास 
वह बैठे मेरे पास |
इधर उनकी तस्वीर मेरे हाथ ,
वह बैठे उस हाथ,
तस्वीर तो देती साथ ,
वह रूठे, बिन कोई बात,
साथ बैठे, फिर भी नहीं साथ |
तस्वीर से करते आलाप,
सुन लेती बिन आवाज़ चुप-चाप |
वह बैठे निस्ताप-
मेरे दर्द से नहीं कोई परिताप,
तस्वीर से मिटाते यादों का सन्ताप |
तस्वीर में देते वह मुस्कान 
देख जीना हो जाता आसन,
पास बैठे न दिखाये रुझान,
बेरुखी से जीना है मौत का फरमान !
मेरे हालात पर नहीं उनका ध्यान
आंसुओं को आँखों में नहीं स्थान |
उन से भली उनकी तस्वीर-
न दिखाये रुतवा, न कोई गरूर
बेजान-निश्चुप रहती जरुर
मरेंगे नहीं,तस्वीर से देते वह नजर,
जी लेते जिन्दगी, वह अपना लेते अगर |
तस्वीर से कियों करते दीदार |

:-सजन कुमार मुरारका

दिल-की-नज्मे




ओ मेरे दिल-ऐ-नादान
चाहत है गुलाब की
पर काँटों से भरा है दामन |
                               ओ मेरे दिल-ऐ-अरमान
                               ओंस भीगे कमल की
                               हुवा हासिल कीचढ़ का फरमान |
ओ मेरे दिल-ऐ-गुमान
रूप की तुलना चाँद की
धब्बों भरा सुन्दरता की पहचान !
                                     ओ मेरे दिल-ऐ-इमान
                                     इश्वर-अल्लाह सा मान
                                     नफरत- है फितरत, कैसे महेरवान ?
ओ मेरे दिल-ऐ-बेजुवान
स्वर-लगा बांसुरी के सुर सा
अनबोल हुवे अल्फाज, निश्चुप है अभिमान |

:-सजन कुमार मुरारका

मन-बादल सा



मन में बसे ,अंतहीन गगन सम आचार
जिसका अंत-आदी का न कोई परापार,
जब छाये दुखी -दुर्बल सा कोई बिचार,
तब लगे नीले अम्बर सा ब्यबहार
सीने में जलन,-आशाओं के प्रहार
तरंगित करते,बेदनाओं के सुप्त तार
ब्रज-बिद्युत सम भरते  संघर्षण की झंकार
तमस विकलता में आकुलता की हाहाकार !
बज्र-कम्पित धरा को झाँकी दिखलाकर,
शून्य-अम्बर से रिसे उम्मीद की जलधार
निखिल से फैलता हुआ प्राणों का आसार
वारिद के झोंके देते नव जीवन आधार
कि चिन्ता है नियति से मिला अधिकार,
मन के ऊपर" महाशून्य"का छाये विकार,
कटु अनुभव,जगाये मन में क्षुद्र विचार ,
नहीं सत्य, सिर्फ वेदना का निर्मम प्रहार
वाष्प बन उड़ जाये, क्षितिज समाये बेहतर
हर्षित इन्द्रधनुषी रंग,रंजित अँजली में भर –
नभ की विशालता में दिखे राहें बेसुमार
घूमता रहता मन बादलों के समान रह रहकर

:-सजन कुमार मुरारका


अन्दर की चिंगारी !!?!!



मेरे अन्दर एक छोटी सी चिंगारी
अति सुक्ष्म्य,भीषण अति कठोर
सीने में जल उठने को बेचैन वारी-वारी

कैसी उथल-पुथल मचे दिल में भारी
जब मन का हर कोन था विभोर
अब फ़रमानी है जग में वेवाफाई तुम्हारी |

बिन बतायें फेंक दिया जैसे_छुत की बीमारी,
कितने बार ख़ाक किया -जला कर
अरमान धूल में मिले,मिटी हसरत हमारी |


 

कितने लम्हे, कितनी रातें, बातें प्यारी-प्यारी,
किया मैंने सुपुर्दे ख़ाक पुर-जोर-
क्या तुम भूल गए?उस दिन की बात सारी |

जब बेठे थे एक साथ,पकढ़ उँगलियाँ तुम्हारी.
शर्माती-लज्जाती, चकित तुम और-!
रक्तिम-वर्ण मुख से उल्लास के हर्ष सम्भारी |

बेइन्तहा प्रेम  का एहसास, बन गई लाचारी
उपेक्षित करने के बावजूद बार-बार,
मैं रहा प्यार में अँधा,मजबूरी समझा तुम्हारी |

कि जानती ही हो तुम, जल उठेंगे हम किसी बारी !
यही नहीं मालूम कि -कब आख़िरी बार ?
जुल्म से भभक  जलेगी यह अन्दर की चिंगारी,|!|

:-सजन कुमार मुरारका