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Sunday, December 9, 2012

शब्द सक्रिय हैं: सुनना केवल तुम

शब्द सक्रिय हैं: सुनना केवल तुम

तेरा प्यार...

रह गया मेरे पास...
तेरा प्यार, तेरी तकरार
बदन की खुशबु,
बालों की महक
अनबोले लम्बे कथन
अनचाही चहक
वह रुदन
कोशीश हँसने की
कुछ सौदेबजी
लम्बी खामोशी
बातें तन्हाई की
रातों की मस्ती
ढल था हुआ आंचल
तेज सांसों की
सीने पर हलचल
बिन सावन बरसे बादल
रह गया मेरे पास...
तेरा प्यार, तेरी तकरार

:-सजन कुमार मुरारका

Sunday, December 2, 2012

तुम एक पत्नी हो !!?

तुम एक पत्नी हो !!?
कभी एकांत के क्षण मे,
निश्चुप, परिवेश मे,
गहराई से,शांती से,
सोचता हूँ :-
जीवन भर साथ देने;
की थी प्रतिज्ञा,
दुःख सुख साथ निभाने,
पर तुम !!
हरदम डरी सी,
शरमाई सी,
अपने आँचल में,
छिपाती सब बातें,
और अपनी गृहस्थी संभाले;
बन गई सब की दासी |
मूर्खा, सोच नहीं पायी,
परम्पराएं,, रीति,रिवाज;
इन्हें सत्य समझ !
जान ही नहीं पायी कि...
जिस बंधन में बंध कर,
जो सहती हो -
एक तरफ़ा निभाके,
अपने को सौभाग्यशाली,
समझने मे,
तुम्हारी बड़ी भुल है |
क्योंकि हर नियम,
तुम पर लागु थे,!
मैं एक पुरुष,
पुरुष-प्रधान व्यवस्था मे,
फूलों का अधिकारी!
काँटों कि चुभन से बचता,
खुश्बू से मदहोश;
शायद ही तुम्हारी पीड़ा समझता !|!
और जिस दिन ...
मैंने यह दुःख समझा,
चुभने लगे कांटे से |
लेकिन ..ऐसा कभी हो ना पाया ...
अनुभूति होने के बाद भी,
खुले मन से,
अभिव्यक्त कर पाने मे,
असमर्थ रहा |
फ़ैला था मेरा संसार दूर तक,
उस अवस्था मे,
संकोच और झूटे अभिमान से;
चुप-चाप देखता,
मन मे थे सपने अनेक,
और उन सपनों को,
कई कई प्रकार से,
कविता मे छुपाकर;
मैं कहता:-
विवेक दंशन से,
तुम्हारे सोने के बाद,
कविता का सहारे,
और मैं...सोचता हूँ !
तुमने पड़ा होगा मुझे,
मेरी कविताओं के जरिये,
अहम या पुरुष्वत-बोध मे;
अब कलेजे से,
तुम्हारी पीड़ा की गठरी लगाये ,
तुम्हारी नज़र से बचकर ,
आज उम्र के इस दौर पर !
मैं समझ पाया;
मै ने बस लेना ही जाना,
लेने में भोगा सुख,
क्योंकि तुम एक पत्नी थी !
और मैं पति |
जिसके कारण तुम सौभाग्यवती,
सीता जैसी पतिव्रता,
मर्यदा मे रहने वाली स्त्री!
और मैं पति | सिर्फ़ पति |

सजन कुमार मुरारका

" पत्नी और कविता -कैसे साथ"

" पत्नी और कविता -कैसे साथ"
दोनो के प्रति है आसक्ती अति;
महानता नहीं,  है मेरी बिपत्ती !
किसी से तो एक नहीं सम्हलती,
हमारे गले तो दो-दो  आ पड़ी  ;D


लाज कैसे बचाये,दिमाग मे न आये,
एक साथ दो नावों की करली सवारी !
पत्नी जरूरत हमारी,कविता मन भाये;
साप-छछुंदर सी हालात हो गई  हमारी  ;)


कहते हम"पत्नी का साया है भारी"
जब सो जाती,तब कविता की बारी ;
पत्नी न देगी तो कौन देगा रोटी ?
पत्नी कहती कविता नहीं देगी रोटी !
;D

आसमान से गिरा,खज़ूर मे लटका !
धोबी का कुत्ता,न घर का-न घाट का |
बीबी और बाहर कविता के बीच :
फंस गये"सजन"दो पाटन के नीच !
:D

जंहा साबुत बचा न कोय,
अब  पछताये क्या होय !
यह दिल की लगी,दिल्लगी हों गई,
शौख-शौखमे अब आदत सी हो गई| :-[

कर सकते,गर आपका उपाय,
तो रहते सुखी,समझ तो आय!
घर मे बीबी और बाहर कविता,
गुलछर्रे उड़ाते, पता न चलता : ::)


छुपाये "कस्तुरी" दिल के अन्दर ;
"मृग"भ्रम मे,असलियत से बेखबर,
खुशबु फ़ैल जाती,छुपाये न छुपती ;
कस्तुरी ही मौत का कारण होती | ???


बात दुजी "जल्दी से सौतन नहीं सुहाती"
घर मे बीबी और बाहर कविता के पति,
महंगाई के ज़माने मे दो को कैसे पाले !
गुलछर्रे भी उड़ायें, पत्नी को भी सम्भाले | ???


बन्धुवर,अब सोच,क्यों करते यह उपाय;
दो-तलवार का डर,फिरभी मन को भाये,
हिम्मत कर,दोनों को साथ-साथ रखते !
पत्नी से प्यार,तभी गहरी रात मे लिखते !! :-*

पत्नी चाहती है रात का वक्त मेरा
कविता के लिये वक्त का बखेड़ा
पत्नी सोने तक रात का वक्त उसका
कविता का पुरा वक्त शेष रात का  ?
  >:(

सजन कुमार मुरारका

मेरी आप -बीती

मेरी आप -बीती

गुस्से मे लाल,
टमाटर जैसे गाल;
पत्नी बोली झुंझलाकर,
शर्म नहीं आती,
रात-रात ज़ागकर,
क्या-कया उठ-पटांग-
लिखते हो ?
कोई पडता भी नहीं!
खुद लिख,खुद खुश,
क्यों घरवालों को;
परेशान करते हो ?
इतना वक़्त,
इतनी लगन,
और काम मे देते ;
तो,दो पैसे घर मे आते!
कम से कम,
हम इज्जत से जीते।
जीना दुर्भर हो गया,
आस-पड़ोस की ;
औरतें जब करे सवाल!
हो जाते कान लाल।
कहती "तम्हारे"
"यह" क्या करते,
शर्म से गड़ जाती ।
सकुचाते कहती,
"कविता" करते !!
फिर भी वे दोहराती,
काम की बात बताओ?
कौशीश कर हार जाती ;
समझा नहीं पाती ।
तुम क्या काम करते हो ?
टिप्पणी मे हाय,
यों सुनने को पाये,
"बेकार" है !
"बीमार " निठ्ला"!!
काम का न काज़ का,
सो सेर अनाज़ का !!!
राम दुहाई ;
हम गहरी सोच मे,
क्या करे, कया ना करे!
इसी उधेड़वन मे,
लिख डाला ,
संदेश उनका ।
कहते हैं लोग,
हर महान पुरुष के,
पीछे होती कोई नारी !
हम पर पत्नी का ;
साया है भारी ।
लाज़ बचाना है दुस्वारी ,
मुस्किल हुवा ;
तय करना !
पत्नी प्यारी या,
कविता मेरी ।

सजन कुमार मुरारका

नशे की हालत मे, दिल की बात :-

नशे की हालत मे, दिल की बात :-

साकी मयखाने मे,छलकाती शबाब प्यालो मे,
पीलाये,  हो-ता नशा, मजा है नशे मे, पीने मे ।

नशा पीने का , और साकी को है - पिलाने का,
चढ़ती दिलो-दिमाग पे , आलम होता नशे का ।


खुशबू साकी की या प्याले की, महकता मयखाना;
रहती है दिलो दिमाग पे, दोनों की अदा छलकाना !


चमन मे फूल खिले,खुशबु फैलाये,और मुरझा जाते,
बहार आती,  दिल बहलाती,  चली जाती होले-होले!

डूबे चाहे जितना साकी मे,नशे मे, बैठ मयखाने मे,
मजा कभी भी पुरा न होता,हद होती, होश गवाने से ।

नशे  की खुमार, जीने के सामान, पिलाये जब साकी ;
पीके मजा,जीने की खुमार ,पीने की चाहत रहती बाकी।

जो नहीं पीते,उन्हें क्या पता,हम क्यों पीने को बेकरार;
लगता,कैसे जीते ?, जिसने साकी का किया नहीं दीदार!

कहते हमे "वह" तुम पीना छोड दो,जीना सीखो शान से,
कहते हम, पीओ तुम, जीना सीखो शान से, हर गम मे !


पीकर जीये,गम गलत किये ,नहीं,कंहा जी पाते ज़माने मे,
सब नशे मे जीते, उनका नशा रहता अलग-अलग भेष मे ।

किसी को धन का नशा,किसी को ताकत का या सत्ता का;
किसी को रूप का,किसी को मान-मर्यादा का या ज्ञान का !

कोई आधुनिकता मे, कोई रुड़ीवादी परम्पराओं मे जीता,
हर शख्स अपनी -अपनी सोच मे  मशगुल हो के रहता ।

धर्म के नाम पर, इन्सान जब, इन्सानियत का लहु पीता,
रोटी,कपड़ा के नाम पर बह्शी,नगां नचाके मोज़ जो करता!

कितने कितने तरह के नशे हैं,किस किस की बात करूँ !
देख हाल दुनिया का, अच्छा है,मैं मेरे पीने के नशे से मरुँ !!

:( :D :P
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नैतिक घोषणा :- यह कविता किसी को भी पीने के लिये प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नहीं लिखी गई है ,इसके बावज़ूद कोई अगर पीता है तो उसका पुर्ण उत्तरदायीत्व,पीनेवाले का खुद का होगा।लेखक,काब्यकोश या सम्बन्धित किसी की  कोई जवाबदेही नहीं होगी। यह घोषणा हर गलत काम करने के बाद, उस से  अपना पल्ला झाड़ने का एक संवेधानिक प्रक्रिया के तहत घोषित करने की आधुनिकतम उपाय मात्र है।
रही बात:-"नशे की हालत मे दिल की बात" की सो मैंने "लिखने" के नशे मे लिखी है। अत: किसी को भी मेरी बात से दु:ख पहुँचा हो तो,नशे के आलम मे कहा-सुनी मुवाफ़ करें और मन को साफ़ करें ।
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सजन कुमार मुरारका

यों ही..कुछ.बात या बेबात...(बेरुखी की)!!!

यों ही..कुछ.बात या बेबात...(बेरुखी की)!!!
अफ़साना यह रहता था,हर तरफ़ प्यार का मंज़र दिखा ;
फूलों से लदी हर शाख मे, मोहब्बत का वास्ता  दिखा !

केका गाई,मयूर नाचा,तितली उड़ी,मन मचल जाता था ;
भवंरेसे फिरते,गुन-गुनाते,चाँद-तारे तोड़ने का ज़ज्बा था !

मोहब्बत को रब जाना , प्रेम-प्यार को इबादत माना ;
मुस्कराहट पर मर मिटते,हर लहज़ा था मीठा-सुहाना !

क्या जाने क्या बात हुई,गुँजन सारे, बेज़ूवान हुवे ;
आँखों के नूर,अब उनकी आखों मे ही खटकने लगे !

वह लम्हा खोना नहीं चाहते थे , जब तुम्हारा साथ था ;
यह लम्हा जीना नहीं चाहते हैं ,जब तुम्हारा साथ छुटा !

तुम्हारी आँखें समझती थीं "दर्द", मेरा भी एक रिश्ता ऐसा !
तुम्हारी नफ़रत का दर्द,"दर्द" से मेरा रिश्ता भी एक ऐसा !


लबों पर था नाम तुम्हारा, मेरे लबों पर नाम है तुम्हारा ;
हिफ़ाजत से दिल मे था,हिफ़ाजत से रखने का दिल मेरा !

हर-रोज़ मिलने की आदत से,न मिलने का यह वीरान सा सफ़र,
ख्वाहिश है,अगर ना मिली तो, खत्म कर दूँ ज़िन्दगी का सफ़र !

सजन कुमार मुरारका

यों ही..कुछ... बात या बेबात.......(विडंबना की)!!!

यों ही..कुछ... बात या बेबात.......(विडंबना की)!!!

कई कई शाम उनके नाम हम ने,कई कई पैगाम लिखे थे,
कसमे ,वादे,इज़हार किया था उम्र भर का साथ निभाने;

प्यार जताने, पत्थर पर उनके साथ नाम जोड़कर लिखा था,
आरजू थी हर प्रेमी,सदीयों ही हमारे प्रेम की दास्ताँ देखेगा!!

हमे क्या पता था, बेज़ान पत्थर पर यों क्यों वक्त जाया क़रते,
"दिल"दार "बेदिल हुवे,पत्थर पर फिर लिखा था " प्यार मे";


पत्थर से भी शक्त, कौशीश हमने की थी बेकार मे,
पत्थर पर फिर भी लिखा हमने, प्यार के जनून मे;

उमीदों के बादल उड़ गये, हव़ा ने दिशा बदल दी ,
एक "ना" से उन्होंने  पूरी   कहानी ही बदल दी ;

प्यारके हर पल मे पुरी ज़िन्दगानी लिखी थी,
दिल के कागज़ पर उनकी कहानी लिखी थी ;


छोटी सी "ना", उन्होंने नई कहानी लिखली ;
हमने तमाम ज़िन्दगी की परेशानी लिख ली !

सजन कुमार मुरारका