Thursday, November 15, 2012

त्रिशूल ....(तृतीय चरण ),,,!!!



त्रिशूल ....(तृतीय चरण ),,,!!!

हुश्न के ज़लवे पर इतना न तुम  इतराव 
चमक दो दिन की,वक़्त रहते संभल जाव

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आईना हुश्ने-जिस्म की खुबशुरती बयां करता है
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मेरे जज़्बात की कद्र कंहा,हर रोज़ यों ही दम तोड़ते
परवाह भला उन्हें क्यों, वह तो मोहब्बत का कारोबार करते
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शायर ही ना होते ग़र इश्क मे बेवफाई का हुनर ना होता
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चोट अब भी लगती पर दर्द होता नहीं
चेतना तो मर  गई पर जिस्म मारा नहीं

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हुक्मरानों की सियासत ने हमें बाँट रखा है
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रास्ते का पत्थर,मन्दिर पहुंचा,प्रभु का दर्जा मिला
ठोकर मारने वाले ,आते जाते सज़दा करते,अन्ध-बिस्वास का भला

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धर्म के नित नये ठेकेदार ;लूट रहें दुनिया सारी
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किसी के दर्द को बांटना हो तो,दिल मे उतर कर देखो
भर के बांहों मे,उसकी आँखों मे खुद की औकात देखो
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दर्द की ग़ज़ल उम्दा होती,दिल की लगन जब लगती
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कुछ सोच मे बदलाव चाहिये इन्कलाब के लिये
बर्फ बने दिलों मे ज्वालामुखी सा रिसाव चाहिये

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मौनम सन्मति लक्षणम,अत: जो सहे वह मरे
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अब रिश्तों का मुल्यायन होता  स्वार्थ के बाज़ार मे
बिचित्र गणित,सास-श्वशुर बदल जाते मात-पिता मे

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तरक्की के दौर मे प्यार भी व्यापार नज़र आता है
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सजन कुमार मुरारका

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